सीएए और सरकार का पक्ष

संसद द्वारा पारित नागरिकता संशोधन कानून को देश के सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई थी। कानून को 160 याचिकाओं द्वारा चुनौती दी गई है। न्यायालय ने पिछली 18 दिसम्बर को सीएए की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं को ले केंद्र सरकार को नोटिस दिया और तब अधिनियम पर प्रतिबंध लगाने से मना किया था। अब सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने अपना पक्ष रखते हुए कहा है कि ‘इस अधिनियम का सीमित उद्देश्य है, लिहाजा अधिनियम को इससे इतर देखने की जरूरत नहीं है। सरकार ने यह भी कहा कि यह अधिनियम संसद के सार्वभौम अधिकार से जुड़ा मसला है, लिहाजा अदालत में इसे लेकर सवाल नहीं उठाए जा सकते। सिर्फ संसद को ही कानून बनाने का अधिकार है। शीर्ष अदालत में सीएए की सांविधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं के जवाब में केंद्र सरकार ने 129 पन्नों का प्रारंभिक हलफनामा दाखिल किया है। इसमें सरकार ने यह भी कहा कि सीएए किसी भी भारतीय नागरिक के मौलिक अधिकारों का हनन नहीं करता है और न ही इससे किसी भारतीय नागरिक का कानूनी, लोकतांत्रिक और धर्म के आधार पर समानता का अधिकार प्रभावित होता है।

सरकार की तरफ से गृह मंत्रालय के निदेशक बीसी जोशी ने हलफनामा दाखिल किया है। इसमें कहा गया है कि यह अधिनियम पूरी तरह से कानूनी है और इससे किसी तरह की सांविधानिक नैतिकता के हनन का कोई सवाल ही नहीं है। याचिकाओं को खारिज किए जाने की अपील करते हुए सरकार ने कहा कि यह अधिनियम न्यायिक परीक्षण के दायरे में नहीं आना चाहिए। सरकार ने कहा है कि भारतीय धर्मनिरपेक्षता ‘अधार्मिक’ नहीं है बल्कि यह सभी धर्मों का संज्ञान लेती है और सौहार्द व भाईचारे को बढ़ावा देती है। सरकार ने कहा, सीएए हितकारी कानून है। यह कानून कुछ चुनिंदा देशों के कुछ समुदायों को रियायत देने वाला है, लेकिन एक निश्चित कट-ऑफ डेट के साथ। यह अधिनियम व्यक्ति के कानूनी, लोकतांत्रिक या पंथनिरपेक्ष अधिकार को प्रभावित नहीं करता है। केंद्र सरकार ने दोटूक कहा है कि यह अधिनियम किसी की नागरिकता छीनने वाला नहीं है बल्कि नागरिकता देने वाला है। सरकार ने यह भी कहा है कि सीएए केंद्र को मनमानी शक्तियां नहीं देता, बल्कि इस कानून के तहत निर्देशित तरीकों से नागरिकता दी जाएगी। सीएए में पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के मुस्लिमों को छोडक़र हिंदू, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन और पारसी आदि छह अल्पसंख्यक समुदायों के ऐसे शरणार्थियों को भारतीय नागरिकता देने का प्रावधान है, जो 31 दिसंबर, 2014 या उससे पहले भारत आ गए थे। मुस्लिमों को बाहर रखे जाने के विरोध में देशभर में विरोध प्रदर्शन चल रहे हैं, लेकिन सरकार ने इस वर्गीकरण को तर्कसंगत बताया है। सरकार ने कहा है कि उसे वर्गीकरण करने का अधिकार है। यह विशेष अधिनियम है और इसे तब तक गलत नहीं कहा जा सकता, जब तक कि वह मनमाना और स्पष्ट भेदभाव वाला न हो।’

अतीत में जाएंगे तो पायेंगे कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नागरिकता संशोधित कानून के पक्ष में बड़े जोरदार ढंग से लोकसभा में अपनी बात कही थी। दिल्ली में शाहीन बाग आन्दोलन व देश के अन्य भागों में हो रहे धरना व प्रदर्शनों को प्रधानमंत्री मोदी ने संशोधित नागिरकता कानून (सीएए) और राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों को हवा देने के लिए विपक्ष को आड़े हाथ लेते हुए कहा था कि संसद एवं विधानसभा के निर्णयों का सडक़ों पर विरोध एवं आगजनी तथा लोगों द्वारा कानूनों को स्वीकार नहीं करने से अराजकता की स्थिति पैदा होगी। प्रधानमंत्री ने राष्ट्रपति अभिभाषण के धन्यवाद प्रस्ताव पर हुई चर्चा का संसद के दोनों सदनों में अलग-अलग जवाब देते हुए आगाह किया कि विधायिका के फैसलों के खिलाफ सडक़ों पर विरोध प्रदर्शनों और आगजनी से अराजकता उत्पन्न हो सकती है, सभी को इससे चिंतित होने की जरूरत है। प्रधानमंत्री ने कहा था कि विरोध प्रदर्शनों की आड़ में अलोकतांत्रिक गतिविधियों को छिपाने के प्रयास हो रहे हैं, इससे किसी को राजनीतिक लाभ नहीं मिलेगा।

उन्होंने कहा था कि विपक्षी दल सीएए एवं एनपीआर के खिलाफ एक काल्पनिक भय पैदा करने का प्रयास कर रहे हैं जो देश के लिए नुकसानदेह है। प्रधानमंत्री के जवाब के बाद दोनों सदनों ने इस धन्यवाद प्रस्ताव को ध्वनिमत से पारित कर दिया। इससे पहले मोदी ने कहा कि सीएए पर हो रहे प्रदर्शनों से देश ने देख लिया कि दल के लिए कौन है और देश के लिए कौन है? उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सीएए से हिन्दुस्तान के किसी भी नागरिक पर किसी भी प्रकार का कोई प्रभाव नहीं पडऩे वाला। मोदी ने सीएए को लेकर विपक्ष पर काल्पनिक भय पैदा करने का आरोप लगाया और उनके रुख को पाकिस्तान के रुख से जोड़ते हुए कहा कि ऐसी ही भाषा पड़ौसी भी बोलता है। नागरिकता कानून के संदर्भ में मोदी ने देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को उद्धृत करते हुए कहा, इसमें कोई संदेह नहीं है कि जो प्रभावित लोग भारत में बसने के लिए आए हैं, वो नागरिकता मिलने के अधिकारी हैं और अगर इसके लिए कानून अनुकूल नहीं है तो कानून में बदलाव होना चाहिए।

नागरिकता संशोधन कानून का संबंध देश के नागरिकों से नहीं है बल्कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में भारत के विभाजन के साथ वहां रह गए उन लोगों से है जो वहां अल्पमत में है और जिन पर उनके धर्म के कारण वहां की सरकारें प्रताडि़त करती हैं। विभाजन से पहले यह भारतीय नागरिक ही थे। इन इस्लामिक देशों में अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचार और उनके जान-माल को खतरे में देखकर ही मोदी सरकार ने मानवीय धर्म को निभाने के साथ-साथ अपने पूर्व नागरिकों के प्रति अपने कत्र्तव्य धर्म को ही निभाया है। विपक्ष राजनीतिक स्वार्थ और संकीर्ण सोच के परिणामस्वरूप ही सीएए को लेकर भ्रम व भ्रांतियां फैला रहा है। अब मामला देश के सर्वोच्च न्यायालय के सामने है और आशा है कि जल्द ही दूध का दूध और पानी का पानी हो देश के सामने आ जाएगा।

- इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।