आत्मा पर बोझ

प्रकाशित समाचार अनुसार घटना 2002 की है, जब पुलिस में बतौर सिपाही भर्ती हुए अपने बेटे की सुविधा के लिए सूबेदार साहब को गांव छोड़कर चीका शिफ्ट होना पड़ा तो उन्होंने घर के साथ ही खरीदे खाली प्लाट में दूध की डेयरी खोल ली। फौज की नौकरी से बतौर सूबेदार रिटायर हुए सूबेदार साहब के लिए हालांकि आमदनी कोई मसला नहीं थी, पर समय तो काटना था इसलिए उन्होंने पांच-छह भैंसों की सेवा में ही अपने आपको व्यस्त रखने का जरिया ढूंढ लिया। 10-12 परिवार सूबेदार साहब के पक्के ग्राहक भी बंध गये। अचानक 2007 में सूबेदार साहब ने सारी भैंसें बेच डालीं और एकाएक डेयरी बंद कर दी। वर्ष 2009 में पोते-पोती की पढ़ाई के लिए चीका से कुरुक्षेत्र शिफ्ट हो गये थे। 10 साल बाद सूबेदार साहब चीका आये और दूध लेने वाले अपनी डेयरी के पुराने ग्राहकों से एक-एक करके मिले। किसी को 8 तो किसी को 10 तो किसी को 20 हजार रुपए के पैकेट पकड़ाये और बोले ये वो अतिरिक्त पैसे हैं जो मैंने दूध में पानी मिलाकर आपसे लिए थे। पांच सालों में जितने पैसे प्योर दूध के बनते थे वो मैंने रख लिए हैं, पानी के पैसे आपको लौटाने आया हूं। ग्राहकों ने पैसे लेने से मना किया तो 70 की उम्र पार कर चुका फौज का रिटायर्ड सूबेदार हाथ जोड़कर खड़ा हो गया और आंखों में आंसू भर लिए। बोला मैंने बहुत सालों तक अपनी आत्मा पर इस बेईमानी का बोझ ढोया है। अब इस बोझ से हल्का होना चाहता हूं। आप बस मेरे लिए परमात्मा से प्रार्थना जरूर करना कि जब मैं उसके पास जाऊं तो वह मुझे इस गलती के लिए माफ कर दे।

जिन्दगी का सत्य यही है कि परमात्मा ने किसी की पीठ पर बोझ डाला है तो किसी की आत्मा पर। बोझ उठाना कोई आसान काम नहीं है लेकिन जो व्यक्ति अपनी आत्मा की आवाज को सुनना बंद कर देता है वह मानव से पशु वृत्ति की ओर बढऩे लगता है। जिसकी आत्मा की आवाज बोझ उठाने के बावजूद जिंदा रहती है। वहीं अंत में एक इंसान के रूप में अपनी पहचान बनाने में सफल होता है। पीठ का बोझ तो इंसान उठा सकता है लेकिन आत्मा का बोझ उठाना मुश्किल है। सूबेदार ने आत्मा के बोझ को उतारने का जो प्रयास किया वह उनका प्रायश्चित ही है, आज ऐसे लोग बहुत कम है। गलती को मान कर सुधार लेने वाला व्यक्ति महान ही माना जाएगा।  परमात्मा सूबेदार द्वारा की गलती को माफ करे और दूसरे ऐसा न करे क्योंकि आत्मा पर पड़ा बोझ उठाना सबसे मुश्किल काम है।

-इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।