चीनी माल का बहिष्कार

11:06 AM Jun 28, 2020 |

जिस दिन चीन ने गलवान घाटी में आगे बढऩे का दुस्साहस किया, हमारे सैनिकों ने बड़ी बहादुरी से उनको रोका और बीस जवानों ने अपने जीवन बलिदान किए। उस दिन पूरे देश में एक रोष, जोश और चीन के विरुद्ध आक्रोश था जो अब भी है। निश्चित ही 1962 से ही हम लोग चीन को अपना मित्र कभी मान नहीं पाए, पर पिछले दिनों जब हमारे प्रधानमंत्री जी ने प्रयास किया, चीनी राष्ट्रपति से मिले, गले लगाया, देश में उन्हें ससम्मान भ्रमण करवाया तो लगता था कि चीन अपना पुराना जहर छोड़ देगा, पर हुआ वही जिसकी संभावना थी। चीन ने पहले भी कई बार किया और अब तो सरेआम हमारे देश की सीमाओं का उल्लंघन कर आगे बढ़ा। राजनीतिक, राजनयिक स्तर पर तो जो बातचीत होनी है, हो रही है। सेना पूरी तैयार है, पर एक आज चिंतनीय विषय यह है कि जब चीन ने हमारी सीमाओं पर कदम बढ़ाया, हमारे जवान शहीद हुए उस समय पूरा देश एक आवाज में एक हो गया। यद्यपि कुछ राजनीतिक लोग अपना बेसुरा राग अलापना नहीं  छोड़ रहे, पर देशवासियों का राष्ट्रभक्ति पूर्ण हृदय छलक उठा। कहीं शहीद सैनिकों की अंतिम विदाई के समय और कहीं पूरे देश में चीनियों के पुतले जलाकर अपने शहीदों को श्रद्धांजलि देने के भावपूर्ण कार्यक्रम किए गए। इसके साथ ही जो स्वदेशी आंदोलन का भाव जागा, चीनी सामान की होली जलाई गई। यह भी कहा गया कि चीन की बनी कोई भी वस्तु लेना देशभक्ति नहीं। लोगों ने चीनी माल की होली भी जलाई, वैसे ही जैसे स्वदेशी आंदोलन के समय स्वतंत्रता से पूर्व देश में विदेशी माल की होली जलती थी और जैसे बंग-भंग आंदोलन के समय 1907-08 में मॉन्चेस्टर के बने सामान के विरुद्ध गुस्सा दिखाई दिया था, वही अब दिखाई दे रहा है। बहुत कम देशवासियों को याद होगा कि बंग-भंग आंदोलन के नेताओं ने जब यह शपथ ले ली कि विदेशी सामान का प्रयोग नहीं होगा, यहां तक कि विवाह जैसे कार्यक्रम में अगर किसी विदेशी वस्तु का प्रयोग किया जाता था तो पुरोहित उनके विवाह की रस्में पूरी करवाने से इंकार कर देते थे। मृत्यु के समय भी ऐसा ही गुस्सा बंगाल की जनता और पंडितों ने दिखाया।

अब भी गुस्सा है। अब भी विदेशी माल के जलने जलाने के पूरे देश से समाचार आ रहे हैं, पर एक प्रश्न है कि यह हमारा गुस्सा कुछ दिनों में शांत क्यों हो जाता है। स्वदेशी आंदोलन जो स्वतंत्रता से पूर्व भी चला और आजादी के बाद भी कुछ वर्षों तक स्वदेशी की चर्चा होती रही वह धीरे-धीरे पूरी तरह गायब हो गया। कुछ लोग ही ऐसे हैं जो स्वदेशी भाषा, स्वदेशी खानपाना, स्वदेशी समान खरीदने में गर्व महसूस करते हैं। अधिकतर तो हालत यह हो गई कि हमारे शहर के मोड़ पर वर्षों से दीपावली की पूजा के खिलौने बेचने वाला कारीगर, दुकानदार हताश सा देखता रहा, देख रहा है। उसकी मूर्तियां पूजा के अन्य समान वहीं पड़े रह जाते। ग्राहक बहुत कम मिलते, पर पूजा हो जाती। चीनी सामान के साथ। इसे क्या कहा जाए दुर्भाग्य या राष्ट्रीय गौरव का अभाव कि हमारी दीपावली पूजा उन मूर्तियों से होने लगी जो चीन से आई थीं। हमारे घरों, मंदिरों तथा अन्य धार्मिक स्थलों पर दीपामाला भी चीन से मंगवाई लडिय़ों से की जाने लगी।
क्या यह सच नहीं कि होली के रंग भी चीनी चिपकारियों से उड़ाने लगे। क्या इससे पहले हमारे देश में होली नहीं मनाई जाती थी या पिचकारियां नहीं थीं। अभाव राष्ट्रीय गौरव का हो गया। और उसी चीन ने सीमा पर हमारे सैनिकों पर, हमारी सीमा पर आक्रमण करके कई घरों में अंधेरा किया। यह ठीक है कि हमने आक्रमण का उत्तर दिया। यह भी ठीक है कि शहादत पर गर्व है, पर यह ठीक नहीं कि सभी संधियों के बावजूद चीन हमारी सीमाओं की ओर अपने नापाक कदम बढ़ाए। यह तो बिल्कुल ठीक नहीं कि चीन का बना हुआ सामान हमारी जिंदगी का एक हिस्सा ही बन जाए। यह ठीक है कि सामान सस्ता मिलता है, पर शहादत तो बहुत महंगी है। पिछले दिनों मुझे एक जागरूक नागरिक ने संदेश भेजा कि जब से जापान पर एटम बम का हमला हुआ, उस दिन से लेकर आज तक चीन अमेरिका का कोई सामान नहीं खरीदता, एक सुई भी नहीं।

मुझे लगता है यह सत्य ही है। कुछ वर्ष पूर्व जब मैं जापान में गई तो बताया गया कि कैलीफोर्निया से आई नारंगियां सड़ गईं, किसी जापान के नागरिक ने उन्हें खरीदा नहीं। क्या हम भारत वाले केवल अभियान चलाएंगे? अभियान तो कुछ दिनों का होता है। कुछ दिन चीनी सामान जला लिया, प्रदर्शन कर लिए, मीडिया और अखबारें में फोटो छप गईं। उसके बाद पतीले के उबाले की तरह हम ठंड हो गए। सागर की गहराइयों जैसा गुस्सा और गंभीरता से कब आएगी? सच तो यह है कि जैसे-जैसे देश आजाद हुआ है हम विदेशी जीवन पद्धति, विदेशी भाषा, विदेशी वस्तुओं के गुलाम होते जा रहे हैं। हमारे भारतेंदु जी ने यह कहा था- अपनी भाषा है भली, भलो अपनो देश, जो कछु है अपनो भलो, यही राष्ट्र संदेश।
वास्तव में यह संदेश आजादी से पहले का था। आजादी के बाद अब यह स्थिति है किसी गांव, गली, मुहल्ले, कस्बे या  नई बनी अमीरों की बड़ी-बड़ी कॉलोनियों में चले जाएं तो मुहल्ले का नाम भी हिंदुस्तानी नहीं। होटल का नाम विदेशी भाषा में। घरों के बाहर नामपट् विदेशी भाषा में।  बच्चों को जो अंग्रेजी में शिक्षा दिलवा सकता है उसे ही अपना भविष्य उज्ज्वल दिखाई देता है। उसके लिए आम आदमी, मध्यमवर्गीय लोग कितनी भी कठिनाई से स्कूलों के खर्च का प्रबंध करें पर करने को विवश हैं। हिंदी, पंजाबी माध्यम में पढ़ाने वाला स्कूल कम फीस लेता है, लेकिन अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाने वाला मोटी लेता है। स्कूलों के बाहर बड़ी शान से लिखा जाता है- अंग्रेजी माध्यम स्कूल। अब तो कड़वे करेले पर नीम चढ़ गई। पूरे देश की तो मुझे सटीक जानकारी नहीं लेकिन पंजाब में तो अब उस स्कूल को ही स्मार्ट स्कूल कहते हैं जहां अंग्रेजी में पढ़ाया जाए और वैसे पूरे उत्तर भारत में शिक्षा में भी अंग्रेजी का बोलबाला है और दीक्षांत समारोहों में तो मैकॉले की जूठन, काले गाउन पहपनते हैं। यह गाउन देश के प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति से लेकर ग्रेजुएट की डिग्री लेने वाला पहनता है। तो कहां गया हमारा स्वदेशी आंदोलन?

यह ठीक है कि बहुत से घरों में चीनी सामान है। अगर उन्हें जलाएंगे तो हमारा अपना नुकसान है, लेकिन चीनी माल अब नहीं खरीदेंगे तो चीन पर चोट होंगी। हम आम आदमी सीमा पर जाकर लड़ नहीं सकते, पर चीन को आर्थिक चोट ऐसी दे सकते हैं जिससे वह कभी उबर नहीं पाएगा। क्या यह शपथ ली जाएगी कि चीनी माल का बहिष्कार केवल एक दो दिन का गुस्सा नहीं, हमारे जीवन का हिस्सा बनेगा। वैसे शपथ लेकर भूल जाना हमारी राजनीति से लेकर सामाजिक जीवन का हिस्सा बन गया है, पर देश के युवकों से, नई पीढ़ी से मेरा आह्वान है कि चीनी माल को हाथ लगाने से पहले यह सोच लें कि हमारे देश के शहीदों का रक्त बोल रहा है कि चीन को आर्थिक चोट मारो। अफसोस से लिख रही हूं कि एक कार्यक्रम में मैंने चीनी माल के बहिष्कार के बड़े-बड़े भाषण सुने, पर उसी कार्यक्रम में बड़ी संख्या में लोग ऐसे बैठे थे जिनके पास चीन के बने बड़े महंगे मोबाइल फोन थे। मुझे नहीं लगता कि किसी के खून ने उबाला खाकर इस चीनी माल जलाओ अभियान में अपना फोन जलाया होगा। कल क्या किया, यह महत्व तो रखता है पर आज और आने वाला कल हमें जो संदेश दे रहा है, आह्वान कर रहा है वह ज्यादा महत्व रखता है। अपने देश की महंगी भली, चीनी सस्ती भी बुरी, पर देश की सरकारों से देश के उद्योगपतियों से निवेदन है कि यह चुनौती है कि चीनी सामान को चोट देने वाली वस्तुएं हमारे देश में क्यों नहीं बनतीं? क्यों नहीं बना सकते? यह राष्ट्रीय गौरव का विषय है। उद्योगपति बनाएं, आम जनता उनका प्रयोग करें, देश का पैसा देश में रहे और चीन की रीढ़ की हड्डी झुके, यही हमारे देशभक्ति है यही आज की शपथ है। यह सोच लीजिए, शपथ लेना तो सरल है पर निभाने के लिए बलिपथ पर बढऩा पड़ता है। केवल शस्त्र लेकर नहंीं, आम जीवन में भी कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। हम करेंगे यह विश्वास है।               -लक्ष्मीकांता चावला