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सीमा सुरक्षा

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सीमा सुरक्षा

केन्द्रीय गृह मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी अनुसार भारत सरकार पाकिस्तान, बलूचिस्तान और चीन से लगे सामरिक महत्व के स्थानों पर सुरक्षा मजबूत करने के लिए सीमा पर चौकसी कर रहे 2 अहम बलो΄ बी.एस.एफ और आई.टी.बी.पी. मे΄ 15 नई बटालियन गठित करने की योजना बना रही है।

मंत्रालय यह सीमा सुरक्षा बल (बी.एस.एफ.) मे΄ 6 बटालियन और भारत-तिबत सीमा पुलिस (आई.टी.बी.पी.) बल मे΄ 9 बटालियन गठित करने पर सक्रियता से विचार कर रहा है। इन बलो΄ की प्रत्येक बटालियन मे΄ करीब 1000 ऑप्रेशनल जवान और अधिकारी होते है΄। बी.एस.एफ. मे΄ मौजूद सूत्रो΄ अनुसार बल की योजना नई इकाई को मंजूरी देकर मानव बल को बढ़ाने की है ताकि उन्हें बंगलादेश से लगी देश की सीमा पर असम और पश्चिम बंगाल मे΄ तैनात किया जा सके। वही΄ भारत-पाक अंतर्राष्ट्रीय सीमा, खासतौर पर पंजाब और जम्मू क्षेत्रो΄ मे΄ सीमा की प्रभावी ढंग से पहरेदारी के लिए भी कर्मियो΄ की जरूरत है। भारतीय सेना प्रमुख जनरल विपिन रावत ने सेना दिवस की पूर्व संध्या पर एक विशेष साक्षात्कार में कहा है कि जम्मू-कश्मीर में मौजूद सशस्त्र बल वर्तमान स्थिति में ही बने नहीं रह सकते हैं। उन्हें हालात का सामना करने के लिए नई रणनीति और युद्धनीति विकसित करने की जरूरत है।

सेना प्रमुख ने कहा कि एक साल पहले जब उन्होंने पद संभाला था, उसकी तुलना में आज हालात बेहतर हुए हैं। उन्होंने साफ संकेत दिया कि सेना आतंकवाद से सख्ती से निपटने की अपनी नीति पर चलती रहेगी। जनरल रावत ने कहा कि राजनीतिक पहल और दूसरे सभी उपाय साथ-साथ चलने चाहिए। जब हम सभी मिलकर काम करेंगे तभी कश्मीर में शांति की स्थापना की जा सकती है। हमें राजनीतिक-सैन्य नजरिया अपनाने की जरूरत है।

पिछले साल अक्टूबर में सरकार ने आइबी के पूर्व प्रमुख दिनेश्वर शर्मा को जम्मू-कश्मीर में सभी पक्षों से बातचीत करने के लिए अपना वार्ताकार नियुक्त किया था। इस पर आर्मी चीफ ने कहा कि जब सरकार ने अपनी ओर से वार्ताकार नियुक्त किया था, तो इसका एक मकसद था कि वह सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर कश्मीर के लोगों तक अपनी बात पहुंचाएंगे। वे देखेंगे कि लोगों की शिकायतें क्या हैं, जिन्हें राजनीतिक स्तर से सुलझाया जा सकता है।

जनरल रावत ने कहा कि कश्मीर मसले को सुलझाने के प्रयासों में सेना केवल एक हिस्सा है। हमारा मकसद आतंकियों को रोकना और कट्टरपंथ के रास्ते जा रहे लोगों को बचाकर शांति के रास्ते पर लाना है। कुछ स्थानीय युवाओं को कट्टरता के रास्ते पर ले जाने की कोशिश हो रही है और वे आतंकी संगठनों में शामिल हो रहे हैं। इससे निपटने के लिए सेना आतंकी सगठनों पर दबाव बनाने की कोशिश कर रही है।

गौरतलब है कि आजादी के तत्काल बाद पाकिस्तान ने हमला कर जम्मू-कश्मीर के एक बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया था जिसे हम पाक अधिकृत कश्मीर के रूप में जानते हैं। 1962 में चीन ने हमला कर भारत के एक बड़े भू-भाग पर कब्जा कर लिया था जो आज भी चीन के कब्जे में है। भारत पाकिस्तान और चीन द्वारा भारतीय भूमि छुड़ाने की बात तो करता है लेकिन छुड़वा नहीं पा रहा क्योंकि भारत को लगता है कि अगर युद्ध शुरू होता है तो जानमाल की बड़ी हानि होने की संभावना है।
तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि पाकिस्तान सरकार भारत विरोधी नीति अपना कर चल रही है और आतंकियों को सहायता भी दे रही है। यही कारण है कि 1948 से लेकर आज तक पाकिस्तान से लगती सीमा पर आए दिन कुछ न कुछ हिंसक होता रहता है। भारत के लाख समझाने के बाद भी पाकिस्तान तथा चीन मिलकर भारत के बढ़ते कदमों की राह पर रोड़े अटकाने का ही काम कर रहे हैं। जनरल रावत ने सैन्य दृष्टि से मजबूत कार्रवाई करने की जो बात कही है उसे संबंधित पार्टियों को गंभीरता से लेने की आवश्यकता है। सरकार ने पाक-चीन से लगती सीमाओं पर बटालियन बढ़ाने की जो बात कही है, उस पर अमल करने की जरूरत है।

पाकिस्तान और चीन के साथ जहां सैन्य स्तर पर कार्रवाई करने की संभावनाएं बढ़ रही हैं, वहीं अंदर खाते सरकार द्वारा पाकिस्तान से संबंध सुधारने हेतु बातचीत का रास्ता खुला रखना चाहिए। नेपाल अगर भारत से दूर जा रहा है तो यह बात भी भारत के राजनीति कद को छोटा करने वाली है। सरकार को सेना व सुरक्षा बलों प्रति अपने कर्तव्य को ईमानदारी से निभाने की आवश्यकता है। इसी तरह स्थानीय प्रशासन को सेना व सुरक्षा बलों के परिवार प्रति अधिक सचेत होने की आवश्यकता है। साथ ही पड़ोसी देशों के साथ राजनीतिक स्तर पर भी बातचीत होनी चाहिए।

भारत की सीमा सुरक्षित रहे और जवान का परिवार असुरक्षित रहे, यह स्थिति भी मंजूर नहीं है। सेना व सुरक्षा बल हमारी सीमाएं सुरक्षित रखते हैं तो उनके परिवारों की सुरक्षा सरकार व समाज का ही दायित्व है। समाज और स्थानीय प्रशासन जितना जवान के परिवार प्रति अपना कर्तव्य निभाएगा तभी सेना व सुरक्षा बल के जवान निर्भय और निडर होकर देश की सीमाएं सुरक्षित रख सकेंगे। 


 -इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।  

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