बोफोर्स, कांग्रेस की दुखती रग

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने चुनावी अभियान के दौरान स्वर्गीय राजीव गांधी व बोफोर्स घोटाले का जिक्र क्या किया कि साठ के दशक में हिट हुए गीत हाल-ए-दिल हमने सुनाया तो बुरा मान गए की तर्ज पर आज कांग्रेस पार्टी तिलमिलाती दिखाई दे रही है। मोदी ने उत्तर प्रदेश की एक चुनावी सभा में राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए कहा, आपके पिताजी को आपके राग दरबारियों ने मिस्टर क्लीन बना दिया था। गाजे-बाजे के साथ मिस्टर क्लीन मिस्टर क्लीन चला था, लेकिन देखते ही देखते भ्रष्टाचारी नंबर वन के रूप में उनका जीवनकाल समाप्त हो गया। कांग्रेस पार्टी ने चुनाव आयोग से मांग की है कि मोदी के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए। प्रधानमंत्री के लिए चोर जैसा असभ्य शब्द प्रयोग करने वाले बड़बोले गांधी भाई-बहन से लेकर गली-मोहल्ला स्तर तक के कांग्रेसी ही नहीं नैतिक स्यापा कर रहे, बल्कि इस गाली गलौज को अपने संपादकीय कालम में स्थान देने वाले मीडिया के एक वर्ग को भी यह आपत्ति है कि राजनीतिक लाभ के लिए पूर्व प्रधानमंत्री राजीव की छवि को तारतार किया जा रहा है। कहा जा रहा है कि फरवरी-मार्च 2004 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने स्वर्गीय राजीव गांधी और एक अन्य आरोपी भटनागर को मामले से बरी कर दिया तो फिर उस व्यक्ति को क्यों बदनाम किया जा रहा है जो अपनी सफाई देने के लिए दुनिया में जिंदा नहीं।

असल में बोफोर्स घोटाला कांग्रेस पार्टी विशेषकर गांधी गौत्र के राजनीतिक परिवार की वह दुखती रग है जिस पर हाथ पड़ते ही पूरी पार्टी कराह जाती है। कई विश्लेषक तो यहां तक कहते हैं कि बोफोर्स के दाग धोने के लिए ही तो बिना प्रमाण के राफेल-राफेल के नाम से झूठ बिलोया गया था परंतु आम चुनाव के लगभग अंतिम चरण में बोफोर्स का जिक्र होते ही अब कांग्रेस का बिलबिलाना समझ में आता है। यह ठीक है कि उच्च न्यायालय ने इस घोटाले में राजीव गांधी को आरोपमुक्त कर दिया परंतु इसके बावजूद भी बहुत से अनुत्तरित प्रश्न अभी भी शेष हैं जिनका कांग्रेस विशेषकर गांधी परिवार को जवाब देर सवेर देना ही होगा। सन् 1987 में यह बात सामने आई थी कि स्वीडन की हथियार कंपनी बोफोर्स ने भारतीय सेना को तोपें आपूर्ति करने का सौदा हथियाने के लिये दलाली चुकाई थी। उस समय प्रधानमंत्री राजीव गांधी थे। स्वीडन की रेडियो ने सबसे इसका पर्दाफाश किया। आरोप था कि गांधी परिवार के नजदीकी इतालवी व्यापारी ओत्तावियो क्वात्रोच्ची ने इस मामले में बिचौलिये की भूमिका अदा की, जिसके बदले में उसे दलाली की रकम का बड़ा हिस्सा मिला। यह ऐसा मसला है, जिस पर 1989 में राजीव गांधी की सरकार चली गई थी। तब विश्वनाथ प्रताप सिंह नायक के तौर पर उभरे। बोफोर्स वह घपला जिसके बाद कभी भी कांग्रेस अकेले के दम पर सरकार में नहीं आ सकी। 

घोटाले के इतिहास का सिंहावलोकन किया जाए तो सामने आता है कि 24 मार्च, 1986 को भारत और स्वीडन की हथियार निर्माता कंपनी एबी बोफोर्स के बीच 155 एमएम की 400 होवित्जर तोप की सप्लाई के लिए 1437 करोड़ रुपये का सौदा हुआ। स्वीडिश रेडियो ने दावा किया कि कंपनी ने सौदे के लिए भारत के वरिष्ठ राजनीतिज्ञों और रक्षा विभाग के अधिकारी को 60 करोड़ रूपये घूस दिए हैं। 20 अप्रैल, 1987 को  लोकसभा में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने बताया था कि न ही कोई रिश्वत दी गई और न ही बीच में किसी बिचौलिये की भूमिका थी। सदन सहित पूरे देश में शोर मचने पर सरकार ने 6 अगस्त, 1987 को मामले की जांच के लिए पूर्व मंत्री बी.शंकरानंद के नेतृत्व में संयुक्त संसदीय कमिटी का गठन किया। 22 जनवरी, 1990 को सीबीआई ने आपराधिक षड्यंत्र, धोखाधड़ी और जालसाजी का मामला दर्ज किया। मामला एबी बोफोर्स के तत्कालीन अध्यक्ष मार्टिन आर्डबो, कथित बिचौलिये विन चड्ढा और हिंदुजा बंधुओं के खिलाफ दर्ज हुआ। मामले का एक अन्य इटली का व्यापारी बिचौलिया क्वात्रोच्ची था जिस पर बोफोर्स घाटाले में दलाली के जरिए घूस खाने का आरोप था। वह भारत छोड़कर फरार हो गया और फिर कभी नहीं आया। दिसंबर 2000 में क्वात्रोच्ची को मलेशिया में गिरफ्तार कर लिया गया। जनवरी 2006 में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और सीबीआई को निर्देश दिया कि क्वात्रोच्ची के खातों के जब्त करने पर यथापूर्व स्थिति बनाए रखा जाए लेकिन उसी दिन ही उसके खाते से पैसा निकाल लिया गया। मार्च-अप्रैल 2011 दिल्ली स्थित सीबीआई के विशेष न्यायालय ने क्वात्रोच्ची को बरी कर दिया और टिप्पणी की कि जनता की गाढ़ी कमाई को देश उसके प्रत्यर्पण पर खर्च नहीं कर सकता हैं क्योंकि पहले ही करीब 250 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं। 14 जुलाई, 2017 को सीबीआई ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय और केंद्र सरकार आदेश दे तो फिर से बोफोर्स मामले की जांच शुरू कर सकती है। 2 फरवरी, 2018 को सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल करके दिल्ली उच्च न्यायालय के 2005 के फैसले को चुनौती दी परंतु यह कहते हुए खारिज कर दिया गया कि याचिका दायर करने में 13 साल विलंब क्यों किया गया।

कुछ यक्ष प्रश्न अभी भी कांग्रेस व गांधी कुटुंब के सम्मुख खड़े हैं जिनका जवाब देश मांग रहा है। कांग्रेस बताए कि उसकी सरकार के कार्यकाल के दौरान क्वात्रोच्ची देश छोड़ कर भागने में सफल कैसे हो गया? पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने क्वात्रोच्ची के खातों  को सील कर दिया तो 2004 में कांग्रेस के सत्ता में आते ही किसके इशारों पर क्वात्रोच्ची बैंकों से राशि निकलवाई गई? यूपीए सरकार ने दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दायर क्यों नहीं की? क्या किसी गबन की जांच को इस हास्यस्पद आधार पर बंद किया जा सकता है कि घोटाला की गई राशि से अधिक खर्च उसकी जांच पर आचुका है? मनमोहन सिंह सरकार के कार्यकाल के दौरान 2011 में सूचना आयोग को यह क्यों कहना पड़ा कि सीबीआई बोफोर्स घोटाले से जुड़े दस्तावेज उपलब्ध नहीं करवा रही? आज कांग्रेस के नेता राजीव गांधी का नाम उछालने को लेकर किस आधार पर नैतिकता की बातें कर रहे हैं जो अभी तक सार्वजनिक मंचों पर चौकीदार चोर जैसे नारे लगा कर गर्वोक्ति व विजयी भाव महसूस करते आरहे थे ? जबकि कांग्रेस के पास न तो मोदी के खिलाफ कोई प्रमाण हैं और न ही दलील, जबकि उक्त प्रश्न वो हैं जिससे कांग्रेस आजतक बचती आई है ? शीशे के घर में रहने वाले जब किसी को पत्थर मारते हैं तो उन्हें खिड़कियों के टूटने पर दूसरों को दोष भी नहीं देना चाहिए।