भाजपा विरोध

पंजाब के मलोट में भाजपा विधायक अरुण नारंग के साथ जो अभद्र व्यवहार किसान आन्दोलनकारियों ने किया उस को देखते हुए आज वह तमाम शक्तियां जो मोदी सरकार का विरोध कर रही हैं, चाहे वह प्रदेश स्तर की हैं या देश तथा विदेश में बैठी हैं, खुश तो बहुत हो रही होंगी क्योंकि उनको लगता होगा कि जो नकारात्मक भाव देश की सरकार तथा सत्तारूढ़ भाजपा के प्रति वह पैदा करना चाहती थी उसमें वह सफल हो गई हैं। 
देश विरोधी और विशेषतया भाजपा व मोदी विरोधी ताकतों ने जो कुछ मलोट में लाखों लोगों द्वारा चुने जन प्रतिनिधि के साथ किया वह कोई पहली घटना नहीं। इस से पहले भी पंजाब में भाजपा नेताओं के विरुद्ध हिंसात्मक हमले हुए हैं लेकिन मलोट में विधायक अरुण नारंग के साथ जो कुछ हुआ उसे किसान आन्दोलनकारियों की हताशा व निराशा की चरम सीमा कहा जा सकता है। इसका कारण है कि जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं उनमें भाजपा का विरोध करने गए किसान नेताओं को किसी ने गम्भीरता से नहीं लिया। दूसरा, भारत बंद पंजाब व हरियाणा को छोड़ देश में बेअसर रहा। उपरोक्त तथ्यों ने किसान आन्दोलनकारियों की हताशा को बढ़ाया और उसका परिणाम मलोट कांड के रूप में प्रदेश व देश वासियों के सामने आया। 
पंजाब में ऐसे कांड भविष्य में और भी देखने को मिल सकते हैं क्योंकि भाजपा पर दबाव डालने के लिए करीब-करीब सभी दल एक ही नीति पर काम कर रहे हैं। अकाली दल बादल, आम आदमी पार्टी, कांग्रेस, वामपंथियों सहित अन्य दल तीनों कृषि कानूनों के नाम पर प्रदेश की राजनीति में हावी होने का प्रयास कर रहे हैं और इन्होंने किसान आन्दोलन का पूरा राजनीतिकरण कर दिया है। 
कृषि कानूनों का विरोध करने का हक अगर किसान संगठनों व भाजपा विरोधी दलों को है और वे अपने-अपने ढंग से कर भी रहे हैं तो ठीक इसी तरह भाजपा सहित कृषि कानूनों के समर्थकों को भी अपनी बात रखने का हक है। लोकतंत्र की सफलता ही इसी बात में है कि पक्ष और विपक्ष अपनी-अपनी बात सार्वजनिक रूप से रख सकते हैं। कृषि कानून भाजपा ने नहीं बल्कि देश की सरकार ने संसद में पारित करवाए हैं। 
देश को चलाने में संविधान और संसद दो महत्वपूर्ण केंद्र हैं। इनके साथ-साथ कार्यपालिका और न्यायपालिका। सरकार द्वारा पारित किसी भी कानून का विरोध लोकतांत्रिक ढंग से हो सकता है। दूसरा न्यायपालिका में कानून को चुनौती दी जा सकती है। कानून को अपने हाथ में लेने का तो किसी को अधिकार नहीं हैं। मलोट में जो कुछ हुआ वह अलोकतंत्रीय, अशोभनीय ही है। अगर पंजाब में इसी तरह की घटनाएं होती रहीं या भाजपा का विरोध जिस ढंग से किया जा रहा है, जारी रहा तो, एक दिन पंजाब एक बार फिर अराजकता की ओर बढ़ जाएगा। 
उपरोक्त स्थिति का इंतजार कर रही देश विरोधी ताकतें मलोट घटना में अपनी जीत देख बहुत खुश हो रही होंगी। मलोट घटना को लेकर जिस तरह राजनीतिक स्वार्थ से ऊपर उठकर करीब-करीब सभी लोकतंत्र में विश्वास रखने वाले नेताओं और दलों ने किया है उससे देश विरोधी ताकतों को यह भी समझ लेना चाहिए कि जन-भावनाओं को भड़काकर क्षणिक लाभ तो मिल सकता है लेकिन प्रदेश और देश में मजबूत लोकतांत्रिक भाव को वह स्थाई तौर पर प्रभावित नहीं कर सकेंगे। 
कै. अमरेंद्र सिंह ने जहां मलोट में भाजपा विधायक अरुण नारंग पर हमला करने वालों विरुद्ध सख्त कार्रवाई करने के आदेश दिए हैं वहीं केन्द्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र तोमर ने स्पष्ट रूप में कहा है कि जिस दिन आन्दोलन कर रहे किसान नेता चाहेंगे हल उसी दिन निकल आएगा। किसान नेताओं  और केन्द्र सरकार को इस वर्ष 22 जनवरी को टूटी वार्ता को दोबारा शुरू करना चाहिए। केन्द्र सरकार संवाद शुरू करने के लिए तैयार दिखाई दे रही है। किसानों को भी हठ छोड़ कर एक सम्मानजनक हल के लिए अपने कदम आगे बढ़ाने चाहिए। पंजाब में भाजपा का विरोध एक सीमा के बाद अपनी उपयोगिता खो जाएगा। मलोट में हुई घटना इसी बात का संकेत दे रही है। तब राजनीतिक दृष्टि से भाजपा विरोधी ही नुकसान में रहेंगे। 

- इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू