Tuesday, November 13, 2018 12:14 PM

भारत रत्न अटल जी

भगवान राम गुरु वशिष्ठ जी से पूछते हैं कि भाग्य क्या है। गुरु वशिष्ठ कहते हैं कि आज किया कर्म ही कल का भाग्य है, इसलिये वर्तमान में जो भी कर्म करें उसे सोच-समझकर सब को करना चाहिये। गीता में भगवान कृष्ण ने भी यही संदेश दिया है कि इंसान का अतीत, वर्तमान और भविष्य तीनों ही उस द्वारा किये कर्म से ही प्रभावित होते हैं। इस संसार में जाते समय इंसान के साथ उस के कर्म ही जाते हैं। वेदों में तो यह कहा गया है कि यशस्वी पुरूष की कभी मृत्यु ही नहीं होती, सदा अमर रहता है।
 
उपरोक्त सभी भाव मां भारती के सपूत भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी की अंतिम यात्रा में जिस तरह देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से लेकर लाखों की गिनती में जन साधारण ने भाग लिया उसको देखकर आये पं. जवाहर लाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा  गांधी के बाद भारतीय राजनीति की दशा और दिशा बदलने वाले अटल बिहारी वाजपेयी पहले गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री थे जिनको इतना मान-सम्मान मिला है। भारत की राजनीति का भारतीयकरण करने का श्रेय अटल बिहारी वाजपेयी जी को ही जाता है। देश की वर्तमान मोदी सरकार भी अटल जी द्वारा दिखाये मार्ग पर ही चल रही है।

देश में आज हिन्दुत्व को लेकर तथा धर्म निरपेक्षता को लेकर बहुत कुछ कहा व लिखा जा रहा है। देश में आज भाजपा के नेतृत्व में ही सरकार का गठन हुआ है और भाजपा को अटल जी ने अपने खून-पसीने से सींचा है। एक साधारण परिवार से उठकर देश के प्रधानमंत्री पद तक पहुंचना और पार्टी के नेतृत्व करने से लेकर उसके आधार को मजबूत व विचारधारा के विस्तार के अनेक कार्यों को अटल जी ने किया है। अटल जी के व्यक्तिव को शब्दों में ब्यान करना मुश्किल है। आजादी के बाद देश के हित को प्राथमिकता देते हुए जिन्दगी के सभी उतार व चढ़ावों का धैर्य से सामना करते हुए उन्होंने अपना रास्ता आप बनाया। आज सार्वजनिक जीवन जीने का जो मार्ग वह बनाकर गये हैं उस पर चलना आम राजनीतिज्ञ व नेता के बस की बात नहीं है। अटल जी के दिखाये मार्ग पर वही चल सकता है जो मां भारती के अतीत, वर्तमान और भविष्य को सम्मुख रख चलने की हिम्मत रखता हो, जिस का लक्ष्य केवल सत्ता पाना ही होगा। वह तो इस मार्ग की ओर एक कदम भी नहीं बढ़ा सकेगा।
 
आज मां भारती का सपूत पंच तत्व में विलीन हो चुका है लेकिन अटल जी के कर्मों, वाणी और कलम ने उन्हें अमर कर दिया है। भारत के इतिहास में एक अमिट छाप छोड़ कर गये हैं। वाजपेयी जी: भारत रत्न अटल जी के मातृभूमि व इसके प्रति भाव ही उनके विराट व्यक्तित्व को समझने के लिए काफी है अटल जी के अनुसार, ''भारत जमीन का टुकड़ा नहीं, जीता-जागता राष्ट्रपुरुष है। हिमालय इसका मस्तक है। गौरीशंकर शिखा है। कश्मीर किरीट है, पंजाब और बंगाल दो विशाल कंधे है। विध्याचल कटि है, नर्मदा करधनी है। पूर्वी और पश्चिमी घाट दो विशाल जंघाएं हैं। कन्याकुमारी इसके चरण है, सागर इसके पग पखारता है। पावस के काले-काले मेघ इसके कुंतल केश है। चांद और सूरज इसकी आरती उतारते हैं। यह वंदन की भूमि है, अभिनंदन की भूमि है। यह तर्पण की भूमि है, यह अर्पण की भूमि है। इसका कंकर-कंकर शंकर है, इसका बिन्दु-बिन्दु गंगाजल है। हम जिएंगे तो इसके लिए, मरेंगे तो इसके लिए। ... समूचा भारत हमारी निष्ठा का केन्द्र और हमारा कार्यक्षेत्र है। भारत की जनता हमारा आराध्य है। हमें अपनी स्वाधीनता को अमर बनाना है, राष्ट्रीय अखंडता को अक्षुण्ण रखना है और विश्व में स्वाभिमान और सम्मान के साथ जीवित रहना है। इसके लिए हमें भारत को सुदृढ़, शक्तिशाली और समृद्धू राष्ट्र बनाना है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए जो साधन आवश्यक होगा, हम अपनाएंगे! जो नीति उपयोगी होगी, उसका अवलम्बन करेंगे, जो कार्यक्रम हितावह होगा, उसका निर्धारण तथा कार्यान्वयन करेंगे। ... आज किसी का अभिनंदन होना चाहिए तो सेना के उन जवानों का अभिनंदन होना चाहिए, जिन्होंने अपने रक्त से विजय की गाथा लिखी है। हमारी सेना ने हमारे इतिहास को बदला है और भूगोल को भी परिवर्तित किया है। एक ही प्रहार में इतिहास बदल गया और भूगोल डोल गया।

स्वाभाविक रूप से हम उन शहीदों के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करें जिन्होंने रणभूमि में वीरगति प्राप्त की है। हमारी विजय का सर्वाधिक श्रेय अगर किसी को दिया जा सकता है तो हमारे बहादुर जवानों को और उनके कुशल सेनापतियों को। ... हिन्दू धर्म के प्रति मेरे आकर्षण का सबसे मुख्य कारण है कि यह मानव का सर्वोत्कृष्ट धर्म है। हिन्दू धर्म न तो किसी एक पुस्तक से जुड़ा है और न ही किसी एक धर्म-प्रवर्तक से, जो कालगति के साथ असंगत हो जा सकते हैं। हिन्दू धर्म का स्वरूप हिन्दू समाज द्वारा निर्मित होता है। और यही कारण है कि यह धर्म युग-युगान्तर से संवर्धित और पुष्पित होता आ रहा है। ... विविधता में एकता भारतीय संस्कृति की विशेषता रही है। हमने एकरूपता की नहीं, अपितु एकता की कामना की है। फलत: देश में अनेक उपासना पद्धतियां, पंथों, दर्शनों, जीवन-प्रणालियों, भाषाओं, साहित्यों और कलाओं का विकास हुआ जो सपन्नता की द्योतक है। हमें उनके प्रति अपनत्व और गौरव का भाव लेकर चलना होगा। किन्तु विधिवता के नाम पर विभाजन को प्रोत्साहन देना भूल होगी। भारतीय संस्कृति कभी किसी एक उपासना- पद्धति से बंधी नहीं रही और न ही उसका आधार प्रादेशिक ही रहा है। मजहब अथवा क्षेत्र के आधार पर पृथक संस्कृति की चर्चा तर्क विरुद्ध ही नहीं प्रत्युत भयावह भी है, क्योंकि वह राष्ट्रीय एकता की जड़ पर ही कुठाराघात करती है। ... कभी-- कभी मुझको लगा है कि देश से अमीर और गरीब के भेद को मिटाना सरल होगा, किन्तु उच्च श्रेणी वर्ग और हरिजन के भेद को मिटाना कठिन होगा और यह देश तब तक उन्नति नहीं करेगा जब तक जातिगत संबंधों में परिवर्तन नहीं होगा। ये संबंध मूलगामी रूप से बदलने चाहिए। स्वस्थ बनने चाहिए। अत: इस विषय को राष्ट्रीय विषय के रूप में लेना जरूरी हैै।

चाणक्य सूत्र में कहा गया है कि मनुष्य का भौतिक शरीर मरता है। उसको यश व कीर्ति रूपी देह नहीं अर्थात उस की कीर्ति बराबर बनी रहती है। अटल जी की यशरूपी देह हमेशा रहेगी और उनके दिये विचार हमारा मार्ग दर्शन करते रहेंगे। भारत की भावी पीढ़ी उन से हमेशा प्रेरणा लेती रहेगी। मां भारती के इस रत्न को सही श्रद्धाजंलि तो यही होगी कि अटल बिहारी वाजपेयी जी द्वारा दिखाये मार्ग पर चल अपने देश की आन और शान को बढ़ाये।

इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।

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