अयोध्या कूच

कुंभ मेले में धर्म संसद के अंतिम दिन ज्योतिष पीठाधीश्वर स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती द्वारा पारित परम धर्मादेश में हिन्दू समाज से बसंत पंचमी के बाद प्रयागराज से अयोध्या के लिए प्रस्थान करने का आह्वान किया गया है। धर्म संसद के समापन के बाद जारी धर्मादेश में कहा गया है, सविनय अवज्ञा आंदोलन के प्रथम चरण में हिन्दुओं की मनोकामना की पूर्ति के लिए यजुर्वेद, कृष्ण यजुर्वेद तथा शतपथ ब्राह्मण में बताए गए इष्टिका न्यास विधि सम्मत कराने के लिए 21 फरवरी, 2019 का शुभ मुहूर्त निकाला गया है। धर्मादेश के मुताबिक, इसके लिए यदि हमें गोली भी खानी पड़़ी या जेल भी जाना पड़े तो उसके लिए हम तैयार हैं। यदि हमारे इस कार्य में सत्ता के 3 अंगों में से किसी द्वारा अवरोध डाला गया तो ऐसी स्थिति में संपूर्ण हिन्दू जनता को यह धर्मादेश जारी करते हैं कि जब तक श्रीराम जन्मभूमि विवाद का फैसला नहीं हो जाता अथवा हमें राम जन्मभूमि प्राप्त नहीं हो जाती, तब तक हर हिन्दू का यह कत्र्तव्य होगा कि 4 इष्टिकाओं को अयोध्या ले जाकर वेदोक्त इष्टिका न्यास पूजन करें। धर्मादेश में कहा गया है, न्यायपालिका की शीघ्र फैसले की अपेक्षा धूमिल होते देख हमने विधायिका से अपेक्षा की और 27 नवम्बर, 2018 को परम धर्मादेश जारी करते हुए भारत सरकार एवं भारत की संसद से अनुरोध किया था कि वे संविधान के अनुच्छेद 133 एवं 137 में अनुच्छेद 226 (3) के अनुसार एक नई कंडिका को संविधान संशोधन के माध्यम से प्रविष्ट कर सुप्रीम कोर्ट को 4 हफ्तों में राम जन्मभूमि विवाद के निस्तारण के लिए बाध्य करें। उन्होंने कहा, लेकिन बड़े दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि संसद में पूर्ण बहुमत वाली सरकार ने राम जन्मभूमि के संबंध में कुछ भी करने से इंकार कर दिया। वहीं दूसरी ओर इस सरकार ने 2 दिन में ही संसद के दोनों सदनों में आरक्षण संबंधित विधेयक पारित करवाकर अपने प्रचंड बहुमत का प्रदर्शन किया था।

स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती द्वारा प्रकट भावों से हिन्दू समाज के रोष का ही प्रगटावा हो रहा है। अयोध्या का अर्थ है जिसे जीता न जा सके। बाबर से लेकर अंतिम मुगल राजा ने अयोध्या को जीत कर हिन्दुओं की भावनाओं और उनकी आस्था को चोट पहुंचाने का ही प्रयास किया लेकिन अयोध्या को लेकर हिन्दू समाज बाबर से लेकर आज तक संघर्ष करता चला आ रहा है। मुगल राज के बाद जब अंग्रेजी हुकूमत स्थापित हुई तब से मुकद्दमेबाजी शुरू हो गई जो आज भी जारी है।

श्रीराम जन्मभूमि पर भव्य श्रीराम मंदिर के मामले में न्यायालय में तारीख पर तारीख डाली जा रही है। देश का बहुमत हिन्दू समाज देश की न्यायिक प्रक्रिया में विश्वास रखता है। इसीलिए वर्षों क्या सदियों से चली आ रही मुकद्दमेबाजी का सामना करता आ रहा है। लेकिन इंतजार की भी कोई सीमा होती है। 100 करोड़ से अधिक हिन्दुओं की आस्था व भावनाओं को उस समय और चोट लगती है जब मुद्दे का राजनीतिकरण कर ब्यानबाजी की जाती है।

स्वतंत्रता के तुरंत बाद हिन्दुओं के आस्था से जुड़े विशेष मंदिरों के साथ जुड़े विवादों को तत्कालीन सरकार को एक अध्यादेश लाकर समाप्त किया जाना चाहिए था पर तुष्टिकरण की नीति के कारण ऐसा नहीं हुआ और यह विवाद बढ़ता चला जा रहा है।

'युद्ध में अयोध्या' के लेखक हेमंत शर्मा अपनी उपरोक्त पुस्तक में लिखते हैं कि 'राम जन्मभूमि विवाद का पहला उपलब्ध प्रमाण अवध के थानेदार शीतल दूबे की 28 दिसम्बर 1858 की वह रिपोर्ट है। इसमें मस्जिद जन्मस्थान के बीचोबीच पंजाब निवासी निहंग सिख फकीर खालसा की पूजा का जिक्र है। निहंग ने यहां गुरु गोविंद सिंह के लिए हवन और पूजन का आयोजन किया था और मस्जिद परिसर के भीतर भगवान का प्रतीक चिह्न भी स्थापित किया था। रिपोर्ट के मुताबिक मस्जिद जन्मस्थान में धार्मिक ध्वज फहराने के लिए वहां उस वक्त 25 सिख भी उपस्थित थे। दो दिन बाद ही बाबरी मस्जिद के खातिब और मुअज्जिन मुहम्मद असगर ने इस मामले पर ब्रिटिश अधिकारियों को शिकायती अर्जी दी (केस नंबर 884, मुहल्ला कोट रामचन्द्र, अयोध्या) उनकी यह शिकायत इस विवाद का सबसे पुराना व्यक्तिगत और निजी दस्तावेज है, जो उस वक्त की स्थितियों पर रोशनी डालता है। इस शिकायत के मुताबिक पंजाब के रहने वाले एक निहंग सिख और एक सरकारी कर्मचारी ने मेहराब और इमाम के चबूतरे के पास एक मिट्टी का चबूतरा बनाया था और इस पर एक धार्मिक तस्वीर भी रख दी। वहां रोशनी और पूजा के लिए अग्नि प्रज्वलित की गई और हवन जारी रहा। पूरी मस्जिद में कोयले से राम-राम लिख दिया गया। मुहम्मद असगर ने यह भी कहा कि बाबरी मस्जिद की बाहरी जगह (मस्जिद की चारदीवारी के भीतर का आंगन) में जन्मस्थान वीरान पड़ा है, जहां हिन्दू सैकड़ों साल से पूजा करते आ रहे थे। उसने जोर देकर कहा कि थानेदार शिवगुलाम की साजिश के चलते वैरागियों ने रातोरात एक बालिश्त की ऊंचाई का चबूतरा बना दिया। जब तक कि इसे रोकने का आदेश या निषेधाज्ञा जारी की जाती, तब तक डिप्टी कमिश्नर ने थानेदार को सस्पेंड कर दिया और वैरागियों पर जुर्माना लगा दिया। लेकिन अब चबूतरा एक गज की ऊंचाई तक उठा दिया गया था। मुहम्मद असगर ने इस वास्ते शहर कोतवाल से उस स्थल का मुआयना करने, नए निर्माण को ध्वस्त करने को कहा। साथ ही हिन्दुओं को वहां से हटाने की गुजारिश की। उसने कहा कि प्रतीक और मूर्तियां वहां से हटा दी जाएं और दीवारों की लिखावट को धो दिया जाए।'

समय की मांग तो यह है कि देश के बहुमत हिन्दू समाज की भावनाओं का आदर करते मुस्लिम समाज ही विवाद को समाप्त करने के लिए विवादित जगह हिन्दू समाज को दे देता, लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हुआ। केंद्र सरकार हिन्दू समाज की भावनाओं को समझते हुए अध्यादेश द्वारा जगह हिन्दू समाज को दे भव्य मंदिर का निर्माण शुरू कर देती। ऐसा भी नहीं हुआ, देश की न्यायपालिका भी मामले की गंभीरता को समझने में शायद असफल हो रही है। इसीलिए संत समाज ने अयोध्या को कूच करने की घोषणा की है। एक लोकतांत्रिक देश में ऐसा कदम अलोकतांत्रिक ही माना जाएगा। 

भावनाओं में बहकर जब निर्णय लिए जाते हैं तो अधिकतर गलत ही होते हैं। कानून को अपने हाथ लेने का अर्थ है अराजकता, अपने ही देश में हम स्वयं ही कैसे अराजकता फैलाने की सोच सकते हैं। संत समाज ने जहां इतना धैर्य व संयम पहले रखा है कुछ समय और रखे। संत समाज का कार्य तो समाज को दिशा देना होता है न कि भटकाना। संत समाज को अयोध्या को कूच के निर्णय पर पुन: विचार कर रोक देना चाहिए और देश की न्यायपालिका पर भरोसा रख अंतिम फैसले का इंतजार करना चाहिए।

-इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।