दुनिया में हिन्दुओं पर हो रहे हमले 

दुनियां में हिन्दुुओं पर एक के बाद दूसरे लक्षित हमले हो रहे हैं लेकिन हमारी क्षुद्र सियासत और उससे बनी सरकारें हाथ पर हाथ धरे तमाशबीन बनी रहती हैं। दो टूक कहें तो इसके विरुद्ध महज खानापूर्ति करके अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ लेती हैं जिससे हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। अमूमन पाकिस्तान, बंगलादेश, और अफगानिस्तान में जिस क्रूरतापूर्वक अल्पसंख्यक हिन्दुुओं को निशाना बनाया जा रहा है, वह उन देशों की शासन व्यवस्था के साथ साथ पूरी विश्व व्यवस्था पर कई सवाल खड़े करने को काफी है। 

गत वर्ष आई एचएएफ की सालाना रिपोर्ट भी इस बात की पुष्टि कर चुकी है कि दक्षिण एशिया में हिन्दुुओं का दमन और उत्पीडऩ लगातार बढ़ता जा रहा है। उनकी हत्याएं हो रही हैं और उनके उपासना स्थल नष्ट किए जा रहे हैं। कमोबेश श्रीलंका, भूटान, फिजी, मलेशिया, त्रिनिदाद-टोबैको आदि देशों में हिन्दू होना अभिशाप बन चुका है। स्पष्ट है कि धर्मनिरपेक्ष भारत सरकार की ‘मूक सहमति’ के बिना ऐसा अनवरत अत्याचार कतई जारी नहीं रह सकता! जी हां, मैं उसी भारत की बात कर रहा हूं जो सन 1947 में हिन्दुुओं के हिस्से आया था लेकिन हमारे मतलबपरस्त उदारवादी नेताओं के चलते अब सबका बनकर रह गया है लेकिन हिन्दुुओं के साथ न्याय न तो कर पा रहा है और न ही वैश्विक मंच पर करवा पा रहा है। कारण क्या हो सकता है, समझना आसान है। कुछ ऐसी ही वजह हैं कि सम्बन्धित देशों में हमारे दूतावास भी हिन्दू उत्पीडऩ पर ज्यादा सक्रियता नहीं दिखा पाते क्योंकि यदि वे ऐसा करेंगे तो उनकी कथित धर्मनिरपेक्षता सवालों के घेरे में खड़ी हो जाएगी। उन पर हिन्दू समर्थक होने का गहरा धब्बा लग जायेगा जिससे भारत के स्वार्थी नेताओं का मुस्लिम वोट बैंक गड़बड़ा जाएगा। मैं मानता हूं कि समकालीन दुनिया ईसाई को प्रथम और मुसलमान को द्वितीय तवज्जो देती है लेकिन तीसरा तवज्जो पाने में भी यदि हमलोग कहीं पिछड़ रहे हैं तो इसके लिए हमारा काहिल और अदूरदर्शी नेतृत्व ही जिम्मेवार है। वैसे तो उम्मीद बंधी हुई है कि मोदी प्रशासन में हिन्दुुओं को आंख दिखाने वाली ताकतें चौंधिया जाएंगी लेकिन दुर्भाग्य से यह सरकार भी कांग्रेस की ट्रू कापी (क्लोन) से ज्यादा दिखाई नहीं पड़ी। यही बात है कि पूरे विश्व में जहां तहां हिन्दुुओं पर अनवरत हमले हो रहे हैं लेकिन हमारी संसद, विधानमंडल और मीडिया महकमों में ऐसी चर्चाएं गायब हैं या नजरअंदाज की जा रही हैं, पड़ताल करने वाली बात है। स्पष्ट है कि भारतीय जनमानस यदि सजग और सक्रिय होता तो शायद दुनिया के तकरीबन 22-24 करोड़ हिन्दुुओं को ऐसी हृदयविदारक और वीभत्स स्थिति का सामना जहां-तहां नहीं करना पड़ता। स्वाभाविक है कि तब देश ही नहीं, दुनिया का मीडिया भी इस सुलगते मामले की उपेक्षा करेगा ही। सच कहा जाए तो बहुधार्मिक, बहुसांस्कृतिक और बहुभाषी होना आधुनिक सभ्य समाज की खूबसूरती है लेकिन लोकतांत्रिक बहुमत के चक्कर में विभिन्न देशों में अल्पसंख्यक बनाम बहुसंख्यक का जो खेल चल रहा है, उससे अल्पसंख्यक मानवता तबाह हो रही है। हिन्दू समाज तो शुरू से ही कुलीन मानसिकता का रहा है, सबकी खुशी में अपनी खुशी समझने वाला रहा है लेकिन अब जिस तरह से उसका पाला कट्टर इस्लाम से पड़ रहा है, वह कोई शुभसंकेत नहीं है। पहले की बात भुला भी दी जाए तो हाल ही में अफगानिस्तान में हिन्दुुओं-सिखों पर हुए आत्मघाती हमले जिसमें लगभग डेढ़ दर्जन से अधिक लोग मारे गए और लगभग दो दर्जन लोग घायल हो गए, ने फिर एक बार देश-दुनिया का ध्यान वैश्विक हिन्दू उत्पीडऩ की ओर खींचा है। अब लोग-बाग इस बात की चर्चा कर रहे हैं कि दुनिया में जहां-जहां भी हिन्दू अल्पसंख्यक हैं, वहां पर वे बहुसंख्यकों के दमन और उत्पीडऩ का सहज शिकार हो रहे हैं। लिहाजा, यह आम धारणा बनती जा रही है कि पाकिस्तान और बांग्लादेश ही नहीं बल्कि श्रीलंका, अफगानिस्तान, म्यांमार, भूटान, फिजी, मलेशिया, त्रिनिदाद-टोबैको आदि देशों में भी हिन्दुुओं को हिंसा और सामाजिक उत्पीडऩ का सामना करना पड़ रहा है।

हिन्दू-अमेरिकी फाउंडेशन की गत वर्ष आई सालाना रिपोर्ट से जाहिर है कि दक्षिण एशिया समेत दुनिया के अन्य हिस्सों में रह रहे हिन्दू अल्पसंख्यकों को कई तरह के कानूनी भेदभाव, प्रतिबंध, धार्मिक आजादी पर बंदिशें, हिंसा, सामाजिक उत्पीडऩ का सामना करना पड़ रहा है क्योंकि उन्हें आर्थिक एवं राजनीतिक रुप से निशाना बनाया जाता है। विभिन्न प्रकार की अद्यतन रिपोर्ट के मुताबिक, ‘बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे देश में हिन्दू महिलाओं को अपहरण और जबरिया धर्मांतरण जैसे अपराधों को सहना पड़ता है। कई देश जहां पर हिन्दू अल्पसंख्यक हैं, वहां पर गैर सरकारी संगठन राज्य के समर्थन से भेदभाव और अलगाववादी एजेंडा चलाते हैं जिसका सामना अल्पसंख्यकों को करना पड़ता है।’ ऐसी ही रिपोर्ट में अफगानिस्तान, बांग्लादेश, मलेशिया और पाकिस्तान को जहां हिन्दू अल्पसंख्यकों के मानवाधिकार के हनन के लिए सबसे खराब मुल्क बताया गया है, वहीं भूटान और श्रीलंका को उन देशों के तौर पर शुमार किया गया है जहां रहने वाली हिन्दू आबादी को लेकर गंभीर चिंता जाहिर की गई है। यही नहीं, फिजी, सऊदी अरब, त्रिनिदाद और टोबैको को भी निगरानी वाले देशों की सूची में रखा गया है। ऐसी रिपोर्ट बताती है कि  ‘राज्य और गैर सरकारी संगठनों के उत्पीडऩ की वजह से हिन्दुुओं को शरणार्थी की तरह बर्ताव करना पड़ता है।’इस बात में कोई दो राय नहीं कि पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे देश में हिन्दुुओं को हिंसा और सामाजिक उत्पीडऩ का सामना करना पड़ रहा है। आलम यह है कि पूरे दक्षिण एशिया में हिन्दू अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव किया जाता है जो सर्वाधिक चिंता का विषय है। याद दिला दें कि पिछले एक दशक में हिन्दुओं पर कई लक्षित हमले हो चुके हैं जिसमें वर्ष 2०16 के अक्टूबर-नवम्बर में बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिन्दू समुदाय पर हुआ हमला भी काफी चर्चित रहा था जिसमें ब्राहम्नबरिया के नसीरनगर इलाके में भीड़ ने 15 हिन्दू मंदिरों पर हमला कर कुछ मूर्तियों को तोड़ दिया था और हिन्दुुओं के 1०० घरों को आग के हवाले करके  लूटपाट भी की गई थी। 

इसी बंगलादेश में वर्ष 2012 में भी बौद्ध मंदिरों पर हमला  किया गया था जिस दौरान दो लोगों की मौत हुई थी। यहां पर उग्र लोगों ने एक आरोपी के घर को भी आग के हवाले कर दिया था। इस दौर में जिन मंदिरों पर हमले हुए, उनमें जगन्नाथ और गौरा मंदिर भी शामिल हैं। उल्लेखनीय है कि ये दोनों मंदिर हिन्दुुओं की आस्था के दो बड़े केंद्र माने जाते हैं। इस हमले में कुछ पुजारी भी घायल हुए थे। चौंकाने वाली बात है कि पूरब की यह खराब लत अब कतिपय पश्चिमी देशों को भी लगती जा रही है और वहां भी इग्गी-दुग्गी ही सही पर हिन्दुुओं पर लक्षित हमले हो रहे हैं। दुनिया का थानेदार अमेरिका और उसका दोस्त ब्रिटेन भी इससे अछूता नहीं है।

कमलेश पांडे (युवराज)