मोदी विरोधी

नेपाल में हुए दो दिवसीय चौथे बिम्सटेक शिखर सम्मेलन के अंत में काठमांडू घोषणापत्र जारी किया गया जिसमें आतंकी हमलों की निंदा की गई। काठमांडू घोषणापत्र में किसी भी जगह किसी के भी द्वारा किए जाने वाले आतंकी कृत्यों और सभी प्रकार के आतंकवाद की निंदा की गयी। सभी सदस्यों देशों की घोषणा में आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में आतंकवादियों, आतंकी संगठनों और नेटवर्कों को निशाना बनाने की भी बात कही गयी। घोषणापत्र में किसी देश का नाम नहीं लिया गया, लेकिन पाकिस्तान पर भारत सहित इसके पड़ोसी देश आतंकवादियों को पनाहगाह देने का आरोप लगाते रहे हैं। इसमें सभी देशों से कहा गया कि वे एक समग्र रुख अपनाएं, जिसमें आतंकवाद से निपटा जा सके।

नेपाल में देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी आतंकवाद विरुद्ध सभी देशों का समर्थन लेने में सफल हुए तो भारत में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को भी पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की तरह बम से उड़ाने की योजना को बेनकाब किया गया। महाराष्ट्र के एडीजी परमबीर सिंह ने प्रेस कांफ्रेंस करके कहा कि रोना विल्सन और भाकपा माओवादी के एक नेता के बीच एक ई-मेल पत्र में राजीव गांधी जैसी घटना के जरिए मोदी राज खत्म करने के बारे में कहा गया है। उन्होंने कहा कि पत्र में ग्रेनेड लांचर खरीदने के लिए 8 करोड़़ रुपए की जरूरत पडऩे का भी जिक्र है। उन्होंने कहा कि ये सभी लोग ओवरग्राउंड रहकर अंडरग्राउंड नक्सलियों की मदद करते थे, उनके लिए फंड जुटाते थे। उन्होंने कहा कि कुछ और लोग पुलिस की जद में हैं। उन्होंने कहा, हमारे पास हजारों चि_ियां हैं, जिनसे साफ होता है कि इनके माओवादियों से संबंध थे। गौरतलब है कि वामपंथी विचारक वरवरा राव, वकील सुधा भरद्वाज, एक्टिविस्ट अरुण फरेरा, गौतम नवलखा और वरुण गोन्सालविस को गिरफ्तार किया गया था जो सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद घर में ही नजरबंद हैं।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में देश में आ रहे राजनीतिक, आर्थिक व सामाजिक परिवर्तन के साथ विचारिक स्तर पर चिंतन शुरू हुआ है। उसको लेकर धर्म-निरपेक्षता व तुष्टिकरण की नीति को आधार बनाकर राजनीति करने वाले काफी परेशान हैं। कांग्रेस और वामपंथियों के निशाने पर तो मोदी है ही, विदेशों में बैठे भारत विरोधियों की सूची में भी प्रधानमंत्री मोदी का नाम सबसे ऊपर है। देश के बाहर और देश के अन्दर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार को गिराने तथा 2019 को होने वाले लोकसभा चुनावों में भाजपा को मात देने के लिए सभी एकजुट हो रहे हैं।

मोदी विरोधियों की एकजुटता का आधार सिद्धांतिक नहीं बल्कि विरोधी का विरोधी दोस्त वाली नीति ही है। 2019 के लोकसभा चुनावों में अभी कुछ माह रहते हैं, इस रहते समय में विरोधी दल एकजुट रहते हैं, इस पर भी अभी प्रश्न चिन्ह ही लगा हुआ है।

पिछले दिनों दिल्ली में भाजपा के मुख्यमंत्रियों के साथ हुई भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की बैठक की जानकारी देते हुए छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह अनुसार बैठक में वर्ष के अंत में होने वाले प्रदेशों के चुनाव को लेकर चर्चा हुई और मुख्यमंत्रियों को सुझाव भी दिए गए।

लेकिन बैठक का निचोड़ यह था कि 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में फिर से सरकार बनेगी। उन्होंने कहा कि डेढ़ दर्जन राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं और यह दावा जमीनी आकलन के आधार पर ही किया जा रहा है। बताते हैं कि दिन भर चली बैठक में केंद्र और राज्य सरकारों की कल्याणकारी योजनाओं पर चर्चा हुई। इन योजनाओं के लाभार्थियों के वृहत आकार पर चर्चा हुई। शाह ने सभी मुख्यमंत्री को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि योजनाएं सही तरह  हर घर तक पहुंचे। ध्यान रहे कि सभी मुख्यमंत्रियों से लाभार्थियों की सूची भी मांगी गई थी। जाहिर है कि माइक्रो और बूथ मैनेजमेंट में माहिर भाजपा आखिरी स्तर तक इसकी समीक्षा भी करेगी। बताते हैं कि केंद्रीय योजनाओं के लाभार्थियों की संख्या लगभग 22 करोड़ है। जबकि भाजपा सदस्यों की संख्या 11 करोड़ के पार है। अगर इन्हें ही दुरुस्त कर लिया जाए तो वोटों की संख्या में भाजपा कोसों आगे होगी। बैठक की मंशा भी यही थी। इस क्रम में उज्ज्वला, ओडीएफ, एमएसपी में बढ़ोत्तरी, आयुष्मान जैसी योजनाओं का जिक्र हुआ। खुद प्रधानमंत्री की ओर से ओबीसी आयोग को संवैधानिक दर्जा, एससी एसटी एक्ट को फिर से लागू करने जैसे फैसले की बात कही गई। एनआरसी असम और पश्चिम बंगाल के लिए तो बड़ा मुद्दा बन ही गया है। भाजपा इसे राष्ट्रवाद का मुद्दा बनाना चाहती है। बैठक में भी यह याद दिलाया गया कि विदेशी घुसपैठियों के लिए देश में कोई स्थान नहीं है। जबकि दूसरे देशों में रह रहे अल्पसंख्यक हिंदुओं को संरक्षण मिलेगा। बैठक में विपक्षी दलों के बीच प्रधानमंत्री पद के लिए की जा रही दावेदारी पर भी तंज कसा गया।

आजादी के 7 दशक बाद देश में एक सकारात्मक बदलाव आ रहा है। इस के परिणामस्वरूप देश की पहचान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी बढ़ी है और देश के भीतर भी वैचारिक मजबूती आई है। इस बदलाव के केंद्र बिन्दू में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हैं, इसलिए जहां भाजपा 2019 के लोकसभा चुनाव प्रधानमंत्री मोदी के नाम व चेहरे के साथ लडऩा चाहती है वही विपक्षी दलों के निशाने पर भी मोदी ही है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि आगामी लोकसभा चुनाव का मुख्य मुद्दा नरेन्द्र मोदी का बने रहना या हटना ही होगा। विदेशों में बैठे भारत विरोधी संगठन और देशों की भी कोशिश है कि साम-दाम-दंड-भेद किसी द्वारा भी मोदी सरकार को सत्ता से बाहर करना ही लगता है। अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए कुछ भी करने को तैयार मोदी विरोधियों का कमजोर पक्ष यह ही है कि वह केवल विरोध के लिए विरोध करते चले जा रहे हैं और जन साधारण इस बात को समझ रहा है। नकारात्मक ढंग या नीति को जन साधारण पसंद नहीं करता, इसलिए मोदी विरोधियों को आत्मचिंतन करने की आवश्यकता है। 

इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।