सुप्रीम कोर्ट की बात मानें आंदोलनकारी किसान

किसान अपनी मांगों को ले कर संघर्ष करें, आंदोलन करें तथा सरकार पर दबाब बनाएं, सरकार उनकी उचित मांगों को स्वीकार करे, इसमें किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। हमारा तो यह कहना है कि आखिर किसान को सड़कों पर उतरना ही क्यों पड़ा? स्वतंत्रता के इतने वर्षों के बाद भी किसान कर्जे के बोझ के तले जिंदगी बसर करने को क्यों मजबूर है? सोना उगलने वाली हमारी पंजाब की धरती जिसे हम  माता धरत महत कहते आये हैं, बंजर कैसे हो गयी? क्या किसानों की इस आर्थिक बदहाली के लिए मोदी शासन के केवल 6 वर्ष जिम्मेवार हैं? क्या किसानों के कष्टों व आंसुओं  के लिए केवल मोदी दोषी है? आश्चर्य की बात है कि हमारे पंजाब के भोले  किसान शरारतपूर्ण दुष्प्रचार के कारण अपनी दुर्दशा के लिए सारा दोष मोदी सरकार को देकर किसानों के वास्तविक मुजरिम कांग्रेस, अकाली दल को क्लीन चिट सा देता दिख रहे हैं। अब तो बरगलाने और बहकाने में माहिर आप पार्टी भी किसान आक्रोश में अपनी राजनीतिक सम्भावनाएँ तलाशने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है। दुष्प्रचार के शिकार हमारे भोले किसान को राजनैतिक दल और आढ़ती आज मसीहा लगने लगे पड़े हैं। जिस आढ़ती को अब तक किसान अपनी जान का दुश्मन मानते थे आज वही आढ़ती उन्हें अपना तारणहार लगने लगा है। यद्यपि बहुत सारे आढ़ती किसान के सुख दु:ख के साथी भी रहते हैं लेकिन यह भी सच  किसान ही बताते हैं कि आढ़ती के मनमाने ब्याज से मुक्त होना किसान के लिए जीवन भर बहुत कठिन होता है। बहुत बार तो सारी फसल या जमीन देकर ही जान छूटती है। आज जब विषय प्रारम्भ हो ही गया है तो इन प्रश्नों पर विचार होना ही चाहिए। वर्तमान एमएसपी या मार्केटिंग कमेटी की व्यवस्था में अगर दम होता तो किसान की यह बुरी हालत क्यों होती? मार्किट कमेटी में फसल बेचती बार फसल की क्वालिटी के नाम पर किसान को आढ़ती और एफसीआई के कितने शोषण का शिकार होना पड़ता है, कौन नहीं जानता? ऐसे में किसान की स्थिति को ठीक करने के उद्देश्य से अगर सरकार कोई प्रयास करती है तो उसे अवसर क्यों नहीं देना चाहिए? आंदोलन करने में कुछ गलत नहीं है लेकिन आंदोलन में जब गाली गोली की बात हो, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की कोशिश हो, समाज को तोडऩे व परस्पर द्वेष फैलाने की बातें हों तो चिंता होना स्वाभाविक ही है। पंजाब में गत एक मास से भी ज्यादा समय से चल रहा किसान आंदोलन यद्यपि अधिकांशत: शांत एवं अनुशासित ही रहा है तो भी इस आंदोलन में एक वर्ग ने जैसा गैर जिम्मेदार व्यवहार किया है, उससे सामान्य व्यक्ति से लेकर सरकार व सुरक्षा एजेंसियों को चिंतित व परेशान कर दिया है। किसान आंदोलन के घटनाक्रम को ध्यान से देखने वाले इसे माओवादी व खालिस्तानी तत्वों का षड्यंत्र मानते हैं।

पंजाब में माओवादी तत्वों ने किसान आंदोलन के बहाने अपने मजबूत नेटवर्क एवं समाज विरोधी विध्वंसक इरादों से एक बार फिर पंजाब को सुलगाने का प्रयास किया है। इस आंदोलन में किसान के कंधे पर बंदूक रख कर माओवादी व खालिस्तानी तत्व खुल कर खेले हैं। किसानों के आक्रोश को इन लोगों ने कुशलता से अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने में उपयोग कर लिया है। यह आंदोलन रातों रात कैसे इतना बड़ा हो गया? पंजाब के गांवों-गांवों से आन्दोलन के लिए संसाधन व राशन कैसे एकत्र होने लग पड़ा? अचानक विदेश से पैसे बरसने कैसे शुरू हो गए? ये सब प्रश्न समाज के साथ साथ सरकार व सुरक्षा एजेंसियों की नींद खराब करने के लिए पर्याप्त है। किसान नेतृत्व को समझना होगा कि अपने अधिकारों के लिए संघर्ष जरूर करें लेकिन मोदी, अम्बानी, अडानी को मर्यादाहीन गलियों की बौछार तो किसान के स्वभाव के विपरीत है। समाज मे हिंसा फैलाना, परस्पर द्वेष उत्पन्न करने की भाषा, टेलीफोन के टॉवर एवं अन्य सरकारी सम्पत्ति को नुकसान पहुंचाना सरबत दा भला की सोच में कहां सही बैठता है? किसान आंदोलन के नाम पर ऐसा व्यवहार किसान आंदोलन को माओवादियों द्वारा हाईजैक कर लेने का संकेत नहीं करता है? क्या समय रहते किसान एवं उनके नेतृत्व को माओवादियों व खालिस्तानी तत्वों के मंसूबों को नहीं समझना चाहिए? सरकार से तार्किक चर्चा न कर कृषि बिलों को खत्म करने की जिद्द क्या सही है? इस पर भी अंहकारी और जिद्दी सरकार को प्रचारित करना कहाँ तक उचित है? निर्दोषों के रक्त से रंगे हैं माओवादी हाथ: हमारे किसान वर्ग को समझना होगा कि गरीबों, शोषितों व पीडि़तों के आंसू पोंछने, उन्हें न्याय दिलाने के लिए हाथ मे शस्त्र उठाने से प्रारम्भ माओवादी नक्सलियों का यह आंदोलन आज स्वयं गरीबों, वनवासियों, शोषितों, पीडि़तों, सामान्य नागरिकों के लिए भस्मासुर बन चुका है। अब तक लाखों निर्दोष लोग व शस्त्रबलों के सैनिक इस आंदोलन की भेंट चढ़ चुके हैं। गरीबों के हित चिंतक कहलाते ये लोग उनकी ही जान के दुश्मन बन गए हैं। माओवादियों की गरीबों के प्रति कथित हमदर्दी समझाने  के लिए संघ के वरिष्ठ प्रचारक स्व. सुरेश राव केतकर जी एक छोटी कहानी सुनाते थे जो कि अत्यंत प्रासंगिक है। एक बार एक बत्तख व हाथी की दोस्ती हो गई। दोनों एक दूसरे के साथ अपना सुख दु:ख सांझा करते थे। समय के चक्र में बत्तख अंडा देकर बीमार पड़ी और कुछ समय बाद चल बसी। बत्तख के जाने से हाथी बहुत दु:खी था। बत्तख के प्रति अपने स्नेह के कारण उसके परिवार की जिम्मेवारी खुद की महसूस करने लगा और अंडे की देखभाल करने लगा। उसने आसपास पता किया कि बत्तख अंडे से बच्चे को कैसे निकालती थी। हाथी को पता चला कि बत्तख अंडे पर बैठ कर उसे सेक देती है और समय आने पर अंडे से बच्चा बाहर आ जाता है। हाथी ने भी बत्तख के परिवार के प्रति अपनी जिम्मेवारी समझते हुए उसके कार्य को पूरा करने के लिए स्वयं ही अंडे पर बैठ गया। आगे क्या हुआ होगा, इसकी कल्पना कर सकते हैं। माओवादी भी हाथी की तरह गरीबों के प्रति अपना दायित्व हिंसा के द्वारा कानून हाथ मे लेकर पूरा करने का प्रयास करते हैं। पंजाब के किसानों को माओवादियों को अपने आंदोलन से प्रयत्नपूर्वक दूर रखना होगा।

वर्तमान विकास का मॉडल बदलना होगा: वर्तमान आर्थिक मॉडल में बहुत कम देशवासी प्रसन्न हैं। देश की स्थिति पर किसी ने बड़ा सुंदर कहा है - यह मत पूछों कहाँ दर्द है? जहां हाथ लगाएं वहीं दर्द है!! फर्क इतना है कि किसान संगठित हो कर अपना दर्द बयां कर पा रहा है लेकिन बहुत बड़ा वर्ग वाहे गुरू मेहर करेंगे यह सोच कर जीवन व्यतीत करता रहता है। आज यह सच है कि देश अनेक उपलब्धियों के बाद भी करोड़ों गरीबों व पीडि़तों के आंसू पोछने में नाकाम रहा है। अभावग्रस्त तथा वंचित वर्ग की पीड़ा और कष्ट दूर करना सरकार की प्रथम प्राथमिकता होनी चाहिए। *बिभुक्षितं किम न करोति पापं या 'भूखे भजन न होय गोपाला' जैसी बातें हमारे शास्त्र व दर्शन मे कई बार अनेक ढंग  से कही गई हैं। हमारे यहां ऐसी बातें केवल कही ही नहीं गई बल्कि गरीबों की पीड़ा को कम करने के लिए दधीचि, रन्तिदेव व  गुरू तेग बहादुर जैसे अनगिनत उदाहरण हमारे समाज में हैं। पश्चिम का वर्तमान आर्थिक विकास का मॉडल भी लोगों को ठगता सा लगता है। विचित्र है कि देश में झुग्गी-झोंपड़ी और बड़े-बड़े भवन साथ-साथ बढ़ रहे हैं। सब जगह बड़े बड़े महल झोंपडिय़ों को चिढ़ाते देखे जा सकते हैं। प्रतिवर्ष झुग्गी झोंपड़ी तथा गरीबी रेखा के नीचे जीवन बसर करने वालों की संख्या बढ़ती जाती है। यह भी तब है जब गरीबी रेखा की परिभाषा अत्यंत शर्मनाक है। आज एक तरफ देश में प्रति व्यक्ति आय भी बढ़ी है, सबसे बड़ा विदेशी मुद्रा का भंडार भी हमारे पास है। मेट्रो के बाद बुलेट ट्रेन के लिए प्रयास चल रहे हैं। चंद्रमा के बाद मंगल पर जाने की देश तैयारी कर रहा है। इतना सब होने के बाद भी यह भी एक कड़वा सत्य है कि आज भी करोड़ों लोग घर विहीन हैं, करोड़ों बच्चे शिक्षा से वंचित हैं, कुपोषित हैं। शिक्षा, चिकित्सा, व न्याय करोड़ों देशवासियों की पहुंच से दूर हैं। देश में बहुत जगह सामाजिक व आर्थिक शोषण चरमसीमा पर है। यह परिस्थिति नक्सलवाद के लिए अत्यंत अनुकूल है। इसके अतिरिक्त अनुसूचित जनजाति और जाति के लोग भारत में लंबे समय तक हाशिये पर धकेले हुए हैं। मानव भले ही स्वभाव से सामाजिक प्राणी होने के कारण हिंसा नहीं करता लेकिन जब एक बड़े वर्ग को समाज किसी कारण से हाशिये पर धकेल देता है, उनकी मूलभूत आवश्यकताएं पूरी न होती हों और पीढी दर पीढी उनका दमन चलता रहता है, यह भी किसी हिंसा से कम नहीं और प्रति हिंसा के लिए माओवादियों के हाथों आसानी से खेल जाता है।

किसान आंदोलन अब समाप्त होना चाहिए: किसान आंदोलन को समाप्त कराने में जहां सरकार को संवेदनशीलता का परिचय देना चाहिए वहीं किसान नेतृत्व को भी अपनी समझदारी दिखानी होगी। सरकार को किसानों की समस्याओं को गम्भीरता एवं समग्रता से सोच कर स्थायी समाधान की योजना करनी चाहिए। किसान नेतृत्व को सरकार की मंशा पर शक न करते हुए उसके प्रयासों का सम्मान करना चाहिए। दोनों पक्षों को परस्पर सौहार्द से समस्या का हल ढूंढना चाहिए। वर्तमान कृषि कानूनों पर सहमति न बनने पर सुप्रीम कोर्ट में जाने का विकल्प उचित लगता है। सरकार को बड़े दिल एवं किसान नेतृत्व को दूरदृष्टि का परिचय देते हुए आंदोलन को समेट कर ठंड में ठिठुरते हजारों किसानों को घर भेजना चाहिए। वर्तमान सरकार से अनेक विषयों में मतभिन्नता को हो सकती है लेकिन गरीबों व किसानों के प्रति सरकार की संवेदनशीलता को तो विरोधी भी स्वीकार करते हैं। किसान के खाते में 6000 प्रतिवर्ष आना, गरीब को 5 लाख तक के मुफ्त इलाज जैसी योजनाएं स्वतंत्रता के पश्चात पहला गम्भीर प्रयास है इसको तो कोई नहीं नकार सकता है। शिखंडी की तरह राजनीतिक दलों को किसानों की आड़ में प्रहार करने से बाज आना चाहिए।

विजय नड्डा, क्षेत्रीय संगठन मंत्री, (विद्या भारती)।
(यह लेखक के निजी विचार हैं।)