आखिर कांग्रेस पार्टी गांधी परिवार के चंगुल से मुक्तक्यों नहीं हो पा रही!

भाग 2 : द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ब्रिटिश हुकूमत काफी कमजोर हो गई थी। 1946 में ब्रिटिश सरकार ने कैबिनेट मिशन प्लान बनाया, जिसके तहत कुछ अंग्रेज अधिकारियों को ये जिम्मेदारी मिली कि वे भारत की आजादी के लिए भारतीय नेताओं से बात करें। फैसला यह हुआ कि भारत में एक अंतरिम सरकार बनेगी। अंतरिम सरकार के तौर पर वायसराय की एक्जिक्यूटिव काऊंसिल बननी थी। अंग्रेज वायसराय को इसका अध्यक्ष होना था, जबकि कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष को इस काउंसिल का वाइस प्रेसिडेंट बनना था। आगे चलकर आजादी के बाद इसी वाइस प्रेसिडेंट का प्रधानमंत्री बनना लगभग तय था। इसी के मद्देनजर अंग्रेज यह चाहते थे कि आने वाला प्रधानमंत्री ऐसा होना चाहिए जो उनके अनुसार चले। इस समय  कांग्रेस में केवल दो विकल्प थे, एक पंडित जवाहरलाल नेहरू और दूसरे सरदार पटेल। सरदार पटेल अपने प्रभाव के लिए प्रसिद्ध थे एवं अंग्रेजों की  इच्छा के अनुरूप चलना उनके स्वभाव में नहीं था। दूसरी ओर जवाहरलाल नेहरू अंग्रेजी संस्कृति में पले  और पढ़े थे, इसलिए नेहरु ही उनके  लिए बेहतर विकल्प थे। यह तय करने के लिए अप्रैल 1946 में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक बुलाई गई । महात्मा गांधी जवाहरलाल नेहरू को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाना चाहते थे, लेकिन आचार्य जेबी कृपलानी ने उन्हें याद दिलाया कि  परंपरा के अनुसार कांग्रेस  की प्रदेश समितियां ही कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव करती हैं।

15 में से 12 प्रांतीय कांग्रेस कमेटियों ने सरदार पटेल का और बची हुई 3 कमेटियों ने कृपलानी का और पट्टाभी सीतारमैया का नाम प्रस्तावित किया था। इसका यह साफ मतलब था कि कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए सरदार पटेल के पास बहुमत था, वहीं जवाहर लाल नेहरू का नाम ही प्रस्तावित नहीं था। लेकिन महात्मा गांधी की इच्छा के सामने जे बी कृपलानी ने नतमस्तक होकर प्रस्ताव किया कि मैं अपना नाम वापस लेता हूं तथा कांग्रेस  अध्यक्ष पद के लिए जवाहरलाल नेहरू के नाम का प्रस्ताव करता हूं। इस प्रकार  पार्टी  की प्रांतीय समितियों  की इच्छा के विरुद्ध  जवाहर लाल  नेहरू को देश का प्रधानमंत्री नियुक्त कर दिया गया। आज़ादी के बाद सत्ता की बागडोर नेहरु जी के हाथ में आ गई, अत: कांग्रेस का अध्यक्ष पद इतना ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं रहा । 1948 में बी. पट्टाभि सीतारमय्या कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए है। इसके बाद 1950 में पुरुषोत्तम दास टंडन, 1951 में पंडित जवाहरलाल नेहरू, 1955 में यूएन ढेबर, 1960 में इंदिरा गांधी, 1961 में एन. संजीव रेड्डी, 1962 में डी. संजिवैया, 1964 में के. कामराज, 1968 में एस. निजिलिंगप्पा, 1969 में सी. सुब्रमण्यम। 1969 में इन्दिरा गांधी का संगठन से टकराव हो गया, जिसके फलस्वरूप कांग्रेस का विभाजन हो गया जिसमे संगठन एक ओर तो दूसरी ओर इंदिरा गांधी का सत्तारूढ़ गुट था जिसे बाद में असली कांग्रेस के रूप में मान्यता मिली। उसके बाद इंदिरा गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव में सावधानी बरतनी शुरू कर दी और केवल नेहरु परिवार के प्रति निष्ठावान व्यक्ति को ही  अध्यक्ष बनाया । इसी कड़ी में 1970 में जगजीवन राम, 1971 में डी. संजिवैया, 1972 में डॉ. शंकर दयाल शर्मा, 1975 में देवकांत बरूआ, 1976 में ब्रह्मनंदा रेड्डी। 1977 में पार्टी की हार के बाद कांग्रेस में मंथन शुरू हुआ और इंदिरा गाँधी के प्रति रोष पनपने लगा।

कभी पार्टी के वफादार रहे वाईबी चव्हाण और ब्रह्मानंद रेड्डी ने बगावत कर दी। वे यह समझने की गलती कर बैठे कि इंदिरा अब एक राजनीतिक बोझ और चुकी हुई शक्ति बन गयी हैं। इन दोनों ने इंदिरा गांधी के खिलाफ बगावत का झंठा बुलंद करते हुए उन्हें राजनीतिक तौर पर अलग-थलग करने की कोशिश की, लेकिन इंदिरा गांधी ने पलटवार करते हुए 1978 के  शुरुआत में पार्टी का विभाजन कर दिया और एक धड़े के साथ अलग होकर अपने नाम वाली नई कांग्रेस- कांग्रेस (आई) बना ली और यही नाम आज तक चल रहा है। 1980 में जब कांग्रेस ने सत्ता में जोरदार वापसी की तो सत्ता का केंद्र तेज तर्रार संजय गाँधी बन गये थे और अपने स्तर पर फैसले लेने लगे थे लेकिन कुछ समय बाद ही विमान दुर्घटना में मृत्यु हो गई। इंदिरा गांधी की मौत के बाद पंडित कमलापति त्रिपाठी कार्यकारी अध्यक्ष बनाए गए। फिर 1984 में राजीव गांधी को पार्टी अध्यक्ष की जि़म्मेदारी सौंपी गई। उनके बाद 1991 में पीवी नरसिंह राव, 1996 में सीताराम केसरी और 1998 में सोनिया गांधी को सर्वसम्मति से कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया। इतिहास गवाह है कि राजीव गाँधी के बाद नेहरु-गाँधी परिवार का कोई सदस्य सरकार का हिस्सा नहीं रहा लेकिन कांग्रेस का अध्यक्ष पद इसी परिवार में घूम रहा है। इस दौरान 2004 से 2014 तक कांग्रेस सत्ता में थी । इस दौरान बेशक नेहरु-गांधी परिवार का कोई सदस्य सरकार में किसी वैधानिक पद पर नहीं रहा, लेकिन सत्ता का असली केंद्र यही परिवार रहा, यह सर्वविदित है। किसी ने भी इस परिवार के प्रति कोई प्रश्न किया, उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।

एक समय अर्जुन सिंह और शरद पवार, तारिक अनवर आदि ने सोनिया गांधी के  विदेशी मूल का मुद्दा उठाया था, उन्हें भी अलग कांग्रेस पार्टी बनानी पड़ी थी । 2004 के बाद कांग्रेस पार्टी में राहुल को भावी नेता के रूप में प्रोजेक्ट करने के लिए कई बार उनके शुभचिंतकों ने आवाज उठाई, लेकिन राहुल बड़ी जिम्मेवारी लेने से कतराते रहे । आखिर 2014 में धूमधाम से राहुल गांधी को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बनाकर कांग्रेस ने चुनाव लड़ा था, लेकिन राहुल गांधी कोई चमत्कार नहीं दिखा सके । जैसे तैसे 5 साल का समय बीता और कांग्रेस को उम्मीद थी कि 2019 में सत्ता विरोधी लहर चलेगी और उस पर सवार होकर राहुल गांधी सत्ता की सीढ़ी चढ़ जायेंगे। राहुल गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष बना कर एड़ी-चोटी का जोर लगाया लेकिन इस बार भी पटाखा फुस्स हो गया। इसके बाद राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठने लगे। फलस्वरूप राहुल गांधी ने हार की जिम्मेवारी लेते हुए कांग्रेस अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दिया और सोनिया गांधी को अंतरिम अध्यक्ष की जिम्मेवारी दे दी गयी। ऐसा नहीं कि कांग्रेस पार्टी के अंदर योग्य नेतृत्व की कमी है लेकिन एक परिवार से बाहर सोच जाती ही  नहीं ।

कांग्रेस के संस्थापकों की आत्मा कांग्रेस के नेतृत्व को विदेशी चंगुल से मुक्त नहीं होने देना चाहती। नेहरु-गांधी परिवार को भी अब विश्वास हो चला है कि राहुल नहीं चल सकता । इसलिए प्रियंका वाड्रा पर भी प्रयास किया जा रहा है। ये तो अस्थाई प्रयास हैं, असली प्रयास तो अगली पीढ़ी को तैयार करने के लिए किया जा रहा है । प्रियंका के बेटे रेहान वाड्रा का नाम रेहान राजीव वाड्रा किया गया। सुना है अब वाड्रा शब्द को हटा कर गांधी जोडऩे की बात चल रही है। उसे  जनता के सामने राजीव गांधी की प्रतिमूर्ति बना पेश करने की  और उसी पर दांव खेलने की तैयारी चल रही है। जब तक रेहान राजीव वाड्रा कांग्रेस की  कमान सम्भालने के काबिल न हो जाए, तब तक सोनिया ही कांग्रेस का नेतृत्व करेंगी। यह कांग्रेस की कार्यसमिति की बैठक से साफ हो गया है, क्योंकि जिस दिन भी कांग्रेस की कमान किसी ऐसे व्यक्ति के हाथ में आ गयी जो दिल से भारतीय हो और कांग्रेस में राष्ट्रवादी विचारधारा पनप गई, तो कांग्रेस की स्थापना का मूल उद्देश्य पूरा नहीं होगा। जब जब कांग्रेस सत्ता में होती है तो राष्ट्रीय सोच वाले लोगों को सत्ता के बल पर दूध में से मक्खी की तरह निकालती रही है, लेकिन अब तो सत्ता दूर तक दिखाई नहीं देती, इसलिए पार्टी की कमान को स्वदेशी हाथ में नहीं जाने देना चाहती।                      -हरिराम धीमान