आखिर कांग्रेस पार्टी गांधी परिवार के चंगुल से मुक्त क्यों नहीं हो पा रही!

भाग 1 : अभी पिछले दिनों कांग्रेस के 23 वरिष्ठ नेताओं ने कांग्रेस पार्टी को बचने के लिए पार्टी की अध्यक्षा सोनिया गांधी को पत्र लिखा तो कांग्रेस की राजनीती में भूचाल आ गया और कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक बुलाई गई। कुछ लोगों ने तो पत्र लिखने वाले नेताओं को बीजेपी का एजेंट तक कह दिया। खैर, पार्टी की कार्यसमिति की बैठक हुई, कांग्रेस के स्थाई अध्यक्ष के मुद्दे पर काफी मंथन हुआ। कुछ लोगों ने राहुल को फिर से अध्यक्ष बनाए जाने की वकालत भी की लेकिन परिणाम आशा के अनुरूप ही था।  सोनिया गांधी को एक वर्ष के लिए फिर से अंतरिम अध्यक्ष बने रहने का अनुरोध किया गया जिसे स्वीकार कर लिया गया, अर्थात जब तक इस परिवार का कोई अन्य सदस्य अध्यक्ष का पदभार संभालने के लायक नहीं हो जाता, सोनिया जी पार्टी की अध्यक्ष बनी रहेंगी। प्रश्न उठता है कि ऐसा क्या है कि कांग्रेस आज एक परिवार से बाहर  नहीं सोच सकती? इसके लिए हमे कांग्रेस पार्टी के इतिहास पर नजर डालना आवश्यक है। जब से हमने होश संभाला और पढऩा शुरू किया उस समय से हमें यही पढ़ाया और रटाया गया कि कांग्रेस ने देश को स्वतंत्र करवाया और इसके नेताओं ने बड़े-बड़े बलिदान दिए।  इतिहास की पुस्तकों में भी यही मिलता है और प्रतीत होता है कि कांग्रेस में भी केवल एक दो परिवारों का ही महत्वपूर्ण योगदान रहा है। यद्यपि स्वतंत्रता संग्राम में अनेक लोगों का भी वर्णन आता है लेकिन समय के साथ साथ वे पृष्ठभूमि में चले गए और कांग्रेस भी केवल एक परिवार तक ही सिमट कर रह गई है। यदि हम ध्यान पूर्वक कांग्रेस की स्थापना से लेकर आज तक के इतिहास एवं घटनाओं पर नजर दौडाएं तो हमें स्पष्ट हो जाता है कि कांग्रेस की स्थापना देश की स्वतंत्रता के लिए नहीं बल के एक विशेष लक्ष्य की प्राप्ति के लिए की गई थी और जब भी कांग्रेस अपने उस लक्ष्य से भटकती नजर आई तो उसे सही रास्ते पर लाने के लिए  योजना पूर्व तरीके से प्रयास किए गए। 

हम सभी को पता है कि 1857 में स्वतंत्रता के प्रथम संग्राम के पश्चात अंग्रेजों को विश्वास हो गया था कि अब वह ज्यादा समय तक भारत पर शासन करने कर पाएंगे। उनकी पकड़ सत्ता पर बराबर बनी रहे इसके लिए उन्होंने वैकल्पिक उपायों पर विचार करना शुरू कर दिया। इसके लिए उन्होंने लोगों के लिए एक ऐसा मंच देने का विचार किया जहां वह अंग्रेजी शासन के विरुद्ध अपने मन की भड़ास को निकाल सकें। कांग्रेस की स्थापना से पूर्व देश में कुछ ऐसे तत्व भी विद्यमान थे जो यह सोचते थे कि जब अंग्रेजों को ही यहां शासन करना है तो फिर क्यों न उनसे मित्रता बनाकर और उनकी प्रशस्ति-स्तुति या जी हुजूरी करके अपने लिए कुछ विशेष अधिकार प्राप्त किए जाएं। इन्हीं तत्वों ने मिलकर राजनीतिक पृष्ठभूमि को इस योग्य बनाया जिस पर विदेशी भावभूमि से आयातित कांग्रेस का संकर बीज बोया जा सका और उस समय उबल रहे राष्टवाद के खिलाफ सुरक्षा वाल्व के तौर पर एक संगठन की आवश्यकता थी। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना 72  प्रतिनिधियों की उपस्थिति के साथ 28 दिसंबर 1885 को मुंबई के गोकुलदास तेजपाल संस्कृत महाविद्यालय में हुई थी पूर्णविराम इसके संस्थापक सचिव ए ओ ह्यूम थे जिन्होंने कोलकाता के व्योमेश चंद्र बनर्जी को अध्यक्ष नियुक्त किया था। अपने शुरुआती दिनों में कांग्रेसका दृष्टिकोण एक कुलीन वर्ग की संस्था का था। इसके शुरुआती सदस्य मुख्य रूप से बाम्बे और मद्रास प्रेसिडेंसी से लिए गए थे।

शुरू में तो कांग्रेस इसकी स्थापना के उद्देश्यों में सफल होती दिखाई दे रही थी लेकिन ज्यों ही कांग्रेस में बाल गंगाधर तिलक पार्टी में सक्रिय भूमिका में आए, उन्होंने ही सबसे पहले स्वराज के लक्ष्य को अपनाया था। यह अंग्रेजों को रास नहीं आ रहा था इसलिए उन्होंने कांग्रेस में दूसरे गुट को भी सक्रिय करना शुरू कर दिया और 1907 तक  आते-आते कांग्रेस में  दो  दल बन गए जिनमें से एक गरम दल के नाम से जाना जाने लगा जिसमे  लाल पाल बाल की तिकड़ी थी तो  दूसरी ओर नरम धड़ा था जिसका नेतृत्व गोपाल कृष्ण गोखले और दादा भाई नौरोजी जैसे लोग कर रहे थे। गरम दल के लोग पूर्ण स्वराज की मांग  कर रहे थे जबकि नरम दल ब्रिटिश राज के अधीन स्वशासन  चाहते थे। 1915 में एकाएक भारतीय राजनीति में महात्मा गांधी का पदार्पण हुआ । इससे पहले वह दक्षिण अफ्रीका में 1893 से लेकर 1914 तक सक्रिय थे। गांधी जी के भारत आगमन के साथ ही कांग्रेस में बहुत बड़ा बदलाव आया। चंपारण एवं खेड़ा में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को जनसमर्थन से अपनी पहली सफलता मिली। इसके  पश्चात कांग्रेस में गर्म दल के सूचक माने जाने वाले तिलक जी को हाशिये पर धकेलने के प्रयास शुरू हो गए शायद इसी लिए तिलक जी ने 1916 में एनी बेसेंट से मिलाकर होम रूल लीग की स्थापना की । 1919 में जलियांवाला बाग कांड के पश्चात गांधी जी कांग्रेस के महासचिव बने और कांग्रेस में राष्ट्रीय नेताओं की एक नई पीढ़ी आई जिनमें सरदार वल्लभभाई पटेल, जवाहरलाल नेहरू, डॉ राजेंद्र प्रसाद, महादेव देसाई एवं सुभाष चंद्र बोस आदि शामिल हैं। 1920 में तिलक जी की मृत्यु के बाद तिलक युग का अंत हो गया। 

तिलक जी की मृत्यु के पश्चात गांधी जी कांग्रेस के सर्वमान्य नेता हो गए और सभी आंदोलन उनके सिद्धांत के अनुसार चलने लगे। इसी दौरान देश में क्रांतिकारियों का आंदोलन अपने स्तर पर चल रहा था, जिसमे  भगत , सुखदेव, राजगुरु आदि क्रांतिकारी अंग्रेज सरकार के विरुद्ध  सक्रिय थे। अपनी आवाज को अंग्रेज सरकार के बहरे कानों तक पहुंचाने के लिए भगत सिंह ने अपने साथियों के साथ असेंबली में बम गिराया था जिसके लिए इन्हें फांसी की सजा सुनाई गई थी। लोगों का मानना है कि अगर गांधी चाहते तो उनके फांसी की सजा को रुकवा सकते थे, लेकिन गांधीजी ने ऐसा नहीं किया। परिणाम स्वरूप मार्च 1931 में उन तीनों क्रांतिकारियों को फांसी दे दी गई और लोगों का गुस्सा गांधीजी के खिलाफ उबलने लगा था, जिसका सामना कांग्रेस को लाहौर अधिवेशन के दौरान करना पड़ा । इसके बाद धीरे धीरे सुभाष चंद्र बोस के भी गांधीजी से मतभेद बढऩे शुरू हो गए थे, जिसकी परिणिति 1939 में कांग्रेस के अध्यक्ष के चुनाव में सुभाष  बाबू के मुकाबले  गांधीजी के  चहेते  उम्मीदवार पट्टाभि सीतारमैया की हार के रूप में हुई। इस अप्रत्याशित हार  के बाद गांधी जी ने कहा थी कि यह मेरी व्यक्तिगत हार है। इसके बाद सुभाष बाबू पर दबाव डालकर त्यागपत्र के लिए मजबूर किया गया। इसके बाद उन्होंने कांग्रेस पार्टी के अंदर ही फॉरवर्ड ब्लॉक नाम से एक अलग गुट की स्थापना की और धीरे-धीरे उनका रास्ता अलग हो गया। इसके पश्चात कांग्रेस पार्टी में महात्मा गांधी के अलावा जवाहर लाल नेहरू एवं सरदार पटेल जैसे महत्वपूर्ण नेता रह गए थे।    -हरिराम धीमान