मुख्य न्यायाधीश पर आरोप

देश के सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई पर न्यायालय की ही एक बर्खास्त महिला कर्मचारी ने यौन उत्पीडऩ का आरोप लगाया है। महिला का आरोप है कि बीते साल अक्टूबर में चीफ जस्टिस ने अपने घर स्थित ऑफिस में दो बार यौन उत्पीडऩ का प्रयास किया। विरोध करने पर उसे नौकरी से बर्खास्त करा दिया। दिल्ली पुलिस में हेड कॉन्स्टेबल पति और देवर को एक आपराधिक केस में सस्पेंड करा दिया। सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त दिव्यांग देवर को भी हटा दिया। दावा किया कि उसे चीफ जस्टिस के घर पर उनकी पत्नी के सामने उनके पांवों में नाक रगडऩे के लिए मजबूर किया। हालांकि, सुप्रिम कोर्ट के सेके्रटरी जनरल ने आरोपों को बेबुनियाद बताया। महिला सुप्रीम कोर्ट में नौकरी के नाम पर 50 हजार की ठगी की आरोपी भी है। इसमें 24 अप्रैल को सुनवाई है। 

महिला ने उपरोक्त ब्योरा जब 22 जजों को पत्र द्वारा भेजा तब मुख्य न्यायाधीश ने न्यायालय जाकर 3 जजों की विशेष पीठ बनाई जिस मेें वह स्वयं भी बैठे और कहा ये साजिश है। अगले हफ्ते मुझे बड़े मामले सुनने हैं। सुनवाई टालने के लिए आरोप लगवाए गए। 2 अन्य जज जस्टिस अरुण मिश्रा और संजीव खन्ना ने बाद में एक ऑर्डर में कहा कि मामले में कोर्ट कोई आदेश नहीं दे रहा। संयम की बात मीडिया के विवेक पर छोड़ रहे हैं, ताकि न्यायपालिका की स्वतंत्रता प्रभावित न हो। मीडिया खुद तय करे कि अवांछित सामग्री प्रकाशित करनी है या नहीं। मामले पर अब नई बेंच विचार करेगी।

बैठक में मुख्य न्यायाधीश गोगोई ने कहा मैं साथी जजों से भी सारी चर्चा करना चाहता हूं। शुक्रवार शाम द वायर, लीफलेट, कारवां और स्क्रोल ने मुझसे संपर्क कर बताया कि सुप्रीम कोर्ट की एक पूर्व कर्मचारी ने मुझ पर यौन उत्पीडऩ का आरोप लगाया है। सुप्रीम कोर्ट में हर कर्मचारी से शिष्ट व्यवहार होता है। मैं ऐसे आधारहीन आरोपों का जवाब देना उचित नहीं समझता। उक्त महिला की आपराधिक पृष्ठभूमि रही है। उस पर दो मामले दर्ज हैं। जब उस पर आपराधिक केस लंबित थे तो उसे सुप्रीम कोर्ट में नौकरी कैसे मिली? मैने दिल्ली पुलिस से रिपोर्ट मांगी है। 20 साल के बेदाग करियर के बाद ऐसे आरोप अविश्वसनीय हैं। मेरे पास 6.80 लाख रुपए का बैंक बैलेंस और पीएफ में करीब 40 लाख रुपए हैं। यही मेरी कुल संपत्ति है। मुझसे ज्यादा संपत्ति तो एक चपरासी के पास भी हो सकती है। जब विरोधी पैसे से मुझे नहीं फंसा पाए तो वह ऐसे आरोप लगवा रहे हैं। मुझे नहीं लगता कि ऐसा षड्यंत्र रचने का साहस जूनियर असिस्टेंट कर सकती है। इसके पीछे बड़ी ताकते हैं। अगले सप्ताह मुझे कुछ बड़े लोगों से जुड़े मामले सुनने हैं। विवाद के पीछे जो हैं, वह सीजेआई ऑफिस को निष्क्रिय करना चाहते हैं। न्यायपालिका गंभीर खतरे में है पर हम ऐसा होने नहीं देंगे। मैं पद पर रहूंगा और बिना डरे सारी जिम्मेदारियां निभाऊंगा और 7 महीने के बचे कार्यकाल में मामलों पर फैसला भी दूंगा। अगर इस तरह जजों को निशाना बनाया जाता रहेगा तो अच्छे लोग जज नहीं बनेंगे। कोई जज केस नहीं सुनेगा। जज के पास सिर्फ सम्मान ही होता है। उसे भी निशाना बनाया जा रहा है। सम्मान पर हमला होगा तो क्या बचेगा? न्यायपालिका को बलि का बकरा नहीं बनाया जा सकता।

मुख्य न्यायाधीश द्वारा अपने ही विरुद्ध लगाये आरोपों की सुनवाई करने के बाद में कानून के विशेषज्ञों की अलग-अलग राये हैं। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस आरएम लोढ़ा ने कहा कि बेहतर यही होता कि सीजेआई अपने खिलाफ लगे आरोपों के लिए गठित बेंच से खुद को अलग कर लेते। वहीं, वरिष्ठ कानूनविद् राकेश द्विवेदी ने भी कहा कि चीफ जस्टिस द्वारा अपने खिलाफ आरोपों की सुनवाई में खुद बैठना और ऑडर पर दस्तखत न करना असमान्य, असाधारण और गैर कानूनी है। उन्हें इस बेंच की अध्यक्षता नहीं करनी चाहिए थी। यह स्थापित सिद्धांत है कि कोई भी अपने मामलों में जज नहीं हो सकता। चीफ जस्टिस सफाई पेश करना चाहते थे तो प्रेस कॉन्फ्रेंस करते। बेंच ने मीडिया रिपोर्टिंग पर रोक तो नहीं लगाई लेकिन जांच किए बिना उपदेश जरूर दिया। मीडिया और महिला के खिलाफ यह न्यायिक आतंकवाद जैसा है। एक वरिष्ठ कानून अधिकारी ने कहा जीफ जस्टिस के इस बेंच में बैठने में कुछ गलत नहीं है। उन्होंने पहले ही कह दिया था कि वह इस मामले में पारित किए जाने वाले न्यायिक आदेश का हिस्सा नहीं होंगे।

उपरोक्त मामले में इश्यू क्या है यह तो छानबीन के बाद ही सामने आयेगा लेकिन मुख्य न्यायाधीश गोगोई ने न्यायापालिका की आजादी खतरे में कहकर स्थिति को और उलझनदार अवश्य बना दिया है। मात्र आरोप लगाने से कोई दोषी नहीं हो जाता लेकिन आरोप कौन और किसपर तथा कितने गंभीर हैं, इस कारण स्थिति अवश्य तनावपूर्ण और रहस्यमय बन जाती है। देश का आम आदमी का सबसे अधिक भरोसा न्यायपालिका पर ही करता है। आज देश के सब से बड़े न्यायाधीश पर लगाये आरोप इस साख को कमजोर न कर पाये इसलिये उपरोक्त सारे मामले की तत्काल जांच व सुनवाई कर तथा जनता के सामने सच्चाई लाना न्यायापालिका की प्राथमिकता होनी चाहिये।

-इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।