सेना के साहस का कायल देश

इंडियन मिलिट्री एकेडमी से हर साल युवा अफसरइस आदर्श वाक्य के साथ पास आउट होते हैं कि हमेशा और हर बार देश की सुरक्षा, सम्मान और कल्याण सर्वोपरि है। उसके बाद आप जिन लोगों को कमांड करते हैं उनकेसम्मान, कल्याण और आराम की बारी आती है। आपके अपने आराम और सुरक्षा की बारी हमेशा और हर बार सबसे अंत में आती है।  इसीबुनियादीदृढ़ता के साथ भारतीय सेना के युवा अफसरों ने करगिल की लड़ाई लड़ी थीऔर देश के सैन्य इतिहास में एक शानदार अध्याय जोड़ा था। वास्तव में यह एक अनोखी लड़ाई थी जो इतनी ऊंचाई पर,काफी दुर्गम इलाके में और पूरी तरह से मोर्चा संभाल चुके दुश्मन के खिलाफ लड़ी गई। हमारे युवा अफसरों और सैनिकों ने हमले का नेतृत्व किया और उन्हें सख्ती से दबोच लिया। उनमें से कई ने तो अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए सर्वोच्च बलिदान दे दिया। ये दिल मांगे मोर से लेकर मैं तुम्हें सितारों से निहारूंगा जैसे उनके तकिया कलाम हर भारतीय के दिलो-दिमाग में अब भी गूंज रहे हैं। उन युद्ध वीरों में से एक ने कहा था -या तो मैं तिरंगा फहराने के बाद वापस आऊंगा या फिर मैं उसमें लिपटा हुआ वापस आऊंगा, लेकिन मैं वापस जरूर आऊंगा। उनमें से कुछ चिर निद्रा में- तिरंगे में लिपटे हुए घर वापस आए। इन नौजवानों की वीरता और बलिदान ने देश का कद ऊंचा कर दिया। सशस्त्र बलों से लेकर संसद तक सभी स्तरों पर नेतृत्व ने वास्तव में उस दौरान कठिन परीक्षा का सामना किया। 

सशस्त्र बलों में आगे बढक़र मोर्चा संभालने और उदाहरण प्रस्तुत करने की परंपरा रही है। लड़ाई में शामिल सैन्य टुकड़ी के नेतृत्व से लेकर शीर्ष नेतृत्व तक ने उस अभियान को शानदार और प्रेरणादायक तरीके से आगे बढ़ाया था। प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने युद्ध के दौरानअगले मोर्चे का दौरा किया और सेना का मनोबल बढ़ाया। उस समय देश तमाम वैचारिक और राजनीतिक मतभेदों को भुलाकर अपने सशस्त्र बलों के पीछे एकजुट खड़ा था।
वर्ष 1999 में उत्तर प्रदेश की तत्कालीन सरकार ने मुझे नोडल मंत्री बनाया था। मुझे सभी शहीदों का पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार करने की व्यवस्था करने का काम सौंपा गया था। ऐसा पहली बार हुआ था कि सभी शहीदों का अंतिम संस्कार पूरे राजकीय सम्मान के साथ किया गया और वह परंपरा आज तक जारी है। प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का दृढ़ता से मानना था कि राष्ट्र के नायकों का उनकी अंतिम यात्रा में पूरे राजकीय सम्मान के साथ स्वागत किया जाना चाहिए। इसने विभिन्न दलों और सामाजिक धरों के बीच पूरे देश को एकजुट किया। लेकिन वह मेरे लिए बेहद दर्द और गर्व का क्षण था। मैंने उन वीर नारियों, बच्चों, माताओं, बहनों और पिता के दु:ख को महसूस किया, जिन्होंने बदले में कुछ भी उम्मीद किए बिना अपने युवा लडक़ों को इस देश के लिए न्योछावर कर दिया।

लगभग दो दशक बाद आज, गलवान घाटी में हमारे बहादुर सैनिकों के सामने फिर वैसी ही परिस्थिति सामने खड़ी हो गई और उन्होंने दुश्मन को करारा जवाब दिया। देश को उनकी बहादुरी पर गर्व है। हमारे प्रधानमंत्री की लेह और सीमावर्ती क्षेत्रों की यात्रा स्पष्ट संकेत और सख्त संदेश देती है कि 130 करोड़ लोगों का निर्विवाद नेता यह आश्?वस्?त करने के लिए वहां मौजूद थे कि पूरा देश सेना के पीछे एकजुट होकर खड़ा है। यह देखकर अत्यंत हर्ष होता है कि जब पूरा देश अपने परिवारों के साथ घर पर दीवाली मना रहा होता हैतो हमारे प्रधानमंत्री सीमावर्ती क्षेत्रों में हमारे सैनिकों के साथ दीवाली मनाते हैं। उन्होंने पिछले छह वर्षों के दौरानलगातार हर साल ऐसा किया और सशस्त्र बलों के बहादुर सैनिकों को अपना परिवार बनाया। इसलिए हमारा नेतृत्व जो कहता है वह करता है। हमारे प्रधानमंत्री के दूरदर्शी नेतृत्व के तहतसेना का आधुनिकीकरण और ऑपरेशन संबंधी उसकी तैयारी नई ऊंचाइयों पर है। सशस्त्र बल और उनकी मांग पर सरकार प्रमुखता से ध्यान दे रही है। हमारे सशस्त्र बलों की मांगों को पूरा करने में कोई देरी या मनाही नहीं है। प्रधानमंत्री ने कुछ दलों के गलत एवं दुर्भावनापूर्ण राजनीतिक प्रचार के बीच अपनी पूरी राजनीतिक पूंजी दांव पर लगा दी लेकिन सशस्त्र बलों के शस्त्रागार में राफेल को शामिल करने की अपनी प्रतिबद्धता से वह पीछे नहीं हटे।

मैं इस कारगिल दिवस के अवसर पर देश के मौजूदा और 1999 के प्रतिबद्ध नेतृत्व के बीच काफी समानताएं देख सकता हूं। बदलते वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भारत एक प्रमुख शक्ति के रूप में उभर रहा है और रक्षा बल व्यापक राष्ट्रीय शक्ति (सीएनपी) का सबसे महत्वपूर्ण तत्व है। इंडिया यानी भारत अब दया, युद्ध विराम और युद्ध लडऩे के लिए विदेशी सहायता का अनुरोध करने वाला देश नहीं है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के डायनेमिक नेतृत्व में हम नई विश्व व्यवस्था और वैश्विक मारक क्षमता सूचकांक में अपनी जगह बना रहे हैं। निस्संदेह हम शांति, समृद्धि और सह-अस्तित्व के पैरोकार हैंलेकिन हम अपनी संप्रभुता से समझौता नहीं कर सकते। केंद्र सरकार राष्ट्रहित में साहसिक निर्णय लेने के लिए प्रतिबद्ध है। हमें याद रखना चाहिए कि जब हम कोई निर्णय लेते हैं तो हमारा झंडा हवा से नहीं बल्कि उन सैनिकों की आखिरी सांस से लहराता है जो इसे बचाने के लिए शहीद हो गए। राष्ट्र के उन वीरों को मेरा सलाम! आज हम अपने उन वीरोंको याद करते हैं जो हमारे पीछे खड़े हैं ताकि हम मुस्कुरा सकें।

-रमेश पोखरियाल निशंक

(लेखक भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्री हैं)