15 वर्षीय बालक ने उठाया गरीब बेसहारा बच्चों को शिक्षित करने का बीड़ा

गौतमबुद्धनगर (उत्तम हिन्दू न्यूज): आजाद भारत को विकसित देशों की कतार में शामिल करने के अटूट इरादे से नोएडा की पाश कालोनी के निवासी 15 वर्षीय एक बालक ने गरीब और बेसहारा बच्चों को शिक्षित करने का बेजोड़ बीड़ा उठाया है।

सेक्टर 92 में निवास कर रहे अरमान सिंह अहलुवालिया आसपास के दर्जनों गरीब बच्चों को विद्यादान दे रहेे हैं। उसका कहना है कि देश में उसके जैसे लाखों बच्चे स्कूली शिक्षा एवं मूलभूत सुविधावो से वंचित है। अगर वह अपनी मेहनत और लगन से इनमे से चंद बच्चों को शिक्षित करने मे सफल रहता है तो देश के प्रति वह इसे अपने कर्तव्य की पूर्ति मानेगा। 

अरमान डीपीएस आर के पुरम से अपनी पढाई कर रहे हैं । पढाई में हमेशा अव्वल ने कहा कि रोजाना स्कूल जाते समय रास्ते में रेड लाइट पर खड़े अनेक गरीब बच्चो को देख कर उसके मन में सवाल उठता थ्रर कि ये बच्चे स्कूल कब जाते होंगे और इनके कपडे, खाना कैसे होता होगा। उसने अपने मन की बात माँ को बतायी और पुछा कि मम्मी इनके लिए कोई कुछ करता क्यों नहीं।

अरमान की मां ने शुरू में इसे नजरअंदाज किया मगर बार बार कुरेदने पर और बेटे के कुछ करने के इरादे को भांपते हुये उन्होंने अपने सेक्टर 108 स्थित मकान के एक हिस्से को देकर अरमान को प्रेरित किया कि वह चाहे तो यहाँ ऐसे बच्चो के लिए कुछ करे। माँ की प्रेरणा और उसके जूनून ने मिलकर एक ऐसी व्यवस्था का आरम्भ किया जहां वह स्कूल एवं पढाई के बाद के बचे समय को इन गरीब बच्चो के उत्थान के लिए समय देने लगा।

किशोर ने उस मकान को सजाया और निकल पड़ा ऐसे बच्चो की तलाश में जो मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं और शुरुवात में उसने लगभग 10 बच्चे इकठ्ठा कर लिए तथा उन्हें शिक्षा और सुविधाएं मुहैया करने लगे। अरमान के माता पिता ने उसकी लगन देखी तो पहले तो उन्हें लगा कि कहीं ये बच्चा अपनी पढाई का नुकसान ना कर दे लेकिन अरमान की अपनी पढाई पर कोई असर न पड़ता देख अरमान की माँ ने पूरे मकान को स्कूल की तरह सजा कर नाम दिया ‘अपने’।

आज ‘अपने’ में समाज के वंचित तबके के दर्जनों बच्चे आते है, यहाँ उन्हें शिक्षा के साथ साथ भोजन, कपड़े, दवाइया तथा भिन्न प्रकार के खेल कूद की सुविधाएं मिलती हैं। अरमान, उनका परिवार तथा उसके मित्र अब अपना जन्मदिन भी इन्ही बच्चो के साथ मनाते हैं और कहते हैं की असली ख़ुशी समाज की सेवा में हैं।

शुरूआती दिनों में जो भी अरमान के इस काम को देखते थे वे लोग हमेशा इसे नकारात्मक दृष्टि से देखते थे और ये अरमान के लिए एक चुनौती थी लेकिन अरमान कहते है की वह एक ऐसे जूनून के साथ इस कार्य में लग चुके थे कि उसे किसी बात की परवाह नहीं थी और वो तो सिर्फ एक ही उद्देश्य से आगे बढ़ते रहे की हर हाल में जो भी उसके पास समय बचेगा उसमे उन बच्चो के लिए समर्पित होकर काम करेगा।

अरमान की माँ डॉ. तरविंदर कौर अहलुवालिया जो की एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में उच्च पद पर कार्यरत थी पर अरमान के सपने को पूरा करने के लिये उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। वो अरमान को हॉवर्ड जैसे संस्थान में पढ़ना चाहती हैं। वही अरमान का इरादा हॉवर्ड जैसे संस्थानों को भारत में लाने का है जिससे समाज के सभी तबको के बच्चो को उचित शिक्षा एवं बेहतर भविष्य मिल सके।

15 वर्षीय बालक का यह प्रयास दूसरो के लिए एक प्रेरणा के रूप में हैं और आज यदि अरमान जैसे और बच्चे ऐसा सोचने लगे तो समाज में ऐसा कोई बच्चा नहीं होगा जो अनपढ़ और बिना भोजन और वस्त्र का रहेगा।

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